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बिहार में फर्जी मुकदमों का जाल: गिरोह एससी-एसटी कानून का दुरुपयोग कर ऐंठ रहा मुआवजा

बिहार में एक संगठित गिरोह एससी-एसटी कानून का गलत इस्तेमाल कर फर्जी मुकदमे दर्ज कराने के नाम पर लोगों से मोटी रकम वसूल रहा है। यह गैंग न केवल झूठी प्राथमिकी दर्ज कराता है, बल्कि सरकारी मुआवजे की राशि पर भी अपना दावा ठोकता है।

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Ankit Yadav
07 अक्ट 2026, 16:11
बिहार में फर्जी मुकदमों का जाल: गिरोह एससी-एसटी कानून का दुरुपयोग कर ऐंठ रहा मुआवजा

राज्य भर में सक्रिय फर्जी मुकदमों का नेटवर्क

बिहार के विभिन्न जिलों में एससी-एसटी अधिनियम के तहत फर्जी मामले दर्ज कराने वाले गिरोहों का एक बड़ा जाल फैला हुआ है। पूर्णिया, किशनगंज, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, पटना तथा पूर्वी एवं पश्चिमी चंपारण जैसे जिलों में ऐसे नेटवर्क के सक्रिय होने के इनपुट मिले हैं। बाढ़ के रहने वाले रवि नामक व्यक्ति ने अपनी मोडस ऑपरेंडी का खुलासा करते हुए बताया कि वह खुद यादव जाति से है, लेकिन फर्जी मामलों की इंडस्ट्री चलाने के लिए उसने एक दलित महिला से विवाह किया है। यह गिरोह शिकायतकर्ता, पीड़ित पक्ष और गवाहों की पूरी व्यवस्था खुद करता है। इनके सदस्य इस कानूनी प्रावधान को बिना लाइसेंस वाले हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं, जिसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को आर्थिक और सामाजिक रूप से पूरी तरह बर्बाद करना होता है। पुलिस थानों में महिलाओं की शिकायतों को प्राथमिकता दिए जाने का लाभ उठाते हुए, ये लोग छेड़छाड़ और जातिसूचक गाली-गलौज के नाम पर मनगढ़ंत प्राथमिकी दर्ज कराते हैं, जिससे कानून की आड़ में निर्दोष लोगों को प्रताड़ित किया जा सके।

आर्थिक लाभ के लिए तय किया गया रेट कार्ड

मुकदमों की पूरी प्रक्रिया के लिए रवि और उसकी साली पिंकी जैसे गिरोह के सदस्य एक निश्चित शुल्क लेते हैं। रवि ने स्पष्ट किया कि आधा भुगतान काम शुरू होने से पहले नकद में चाहिए और शेष राशि मामले के बाद ली जाती है। इस गिरोह का दावा है कि उनके वकील भी सेट हैं, जो प्राथमिकी दर्ज होने के बाद पूरी कानूनी प्रक्रिया को अंजाम तक पहुंचाते हैं। वे केवल उस व्यक्ति की फोटो और व्यक्तिगत विवरण मांगते हैं जिसे फंसाना होता है। इस प्रक्रिया में रवि की पत्नी और उसके परिवार के अन्य सदस्य गवाह के रूप में शामिल होते हैं। गिरोह का कहना है कि वे केस दर्ज कराने के बाद बेलर की भूमिका भी निभाते हैं। रवि ने बताया कि मुजफ्फरपुर के एक रिश्तेदार से उसे यह तरीका सीखने को मिला था, जिसके बाद उसने इसे अपनी कमाई का मुख्य जरिया बना लिया। इस पूरी डील में आने-जाने, खाने-पीने और रहने का खर्च भी क्लाइंट को ही उठाना पड़ता है, जबकि सरकारी मुआवजे की राशि पर भी गिरोह का ही कब्जा होता है।

कानून का दुरुपयोग और सरकारी मुआवजे का खेल

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 का मूल उद्देश्य इन समुदायों को सुरक्षा प्रदान करना था, लेकिन बिहार में इसे कमाई का हथियार बनाया जा रहा है। गिरोह के लोग इस कानून को बिना लाइसेंस का ऐसा अस्त्र मानते हैं जिससे पड़ोसी और दुश्मन भी डरते हैं। रवि का कहना है कि उसने पहले भी जमीन विवाद के मामलों में पड़ोसियों को डराने के लिए इसी तरह के झूठे मुकदमे दर्ज कराए थे, जिसके कारण लोग समझौता करने पर मजबूर हो गए। इस धंधे में शामिल होने वाले लोग अब इस पर पूरी तरह निर्भर हैं और केस खत्म कराने के बदले मिलने वाली रकम के प्रस्तावों को भी ठुकरा देते हैं। सरकारी अनुदान की मोटी रकम हड़पने के लिए वे पूरे परिवार को गवाही में शामिल कर लेते हैं। आम लोगों के लिए यह स्थिति बेहद खतरनाक है, क्योंकि पुलिस के पास महिला की शिकायत आने पर तुरंत प्राथमिकी दर्ज करने की मजबूरी होती है। ऐसे में कानून का यह गलत इस्तेमाल समाज में डर का माहौल पैदा कर रहा है और प्रशासन के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन गया है।

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