जिले में तेंदुओं का खौफनाक मंजर
उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के निवासी इस समय गहरे डर के साये में जी रहे हैं। यहां के किसान सुबह खेतों में काम करने निकलते हैं तो परिवार के सदस्य शाम तक उनकी सकुशल वापसी की कामना करते हैं। जिले का भूगोल और पर्यावरण में आ रहे बदलाव तेंदुओं के लिए अनुकूल साबित हो रहे हैं। यह इलाका इस समय इंसानों और तेंदुओं के बीच एक खूनी संघर्ष का अखाड़ा बन चुका है। नजीबाबाद, अफजलगढ़, रेहड़ और कोतवाली देहात ऐसे क्षेत्र हैं जहां गुलदारों की सक्रियता सबसे अधिक देखी जा रही है। इन क्षेत्रों में तेंदुए लगातार ग्रामीणों को अपना निशाना बना रहे हैं। वन विभाग के अनुसार, बिजनौर के विभिन्न इलाकों में इस समय लगभग 500 गुलदार मौजूद हैं। इन जंगली जानवरों की बढ़ती संख्या के कारण स्थानीय लोगों का जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो चुका है और खेतों में जाना भी जोखिम भरा हो गया है।
वन विभाग के सुरक्षा दावों की हकीकत
तेंदुओं के बढ़ते हमलों को रोकने के लिए वन विभाग ने जिले में अब तक 108 पिंजरे लगाए हैं। विभागीय आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन सालों में वन विभाग ने करीब 106 गुलदारों को पकड़ने में सफलता पाई है। डीएफओ जय चंद्र कुशवाहा ने बताया कि जिले में पिछले तीन वर्षों के दौरान कुल 19 लोगों की मौत हुई है, जबकि 44 लोग इन हमलों में घायल हुए हैं। इसके साथ ही, इस अवधि में लगभग 74 से 75 गुलदारों की भी मौत दर्ज की गई है। वन विभाग के अधिकारी लगातार इनकी बढ़ती संख्या को लेकर चिंतित हैं, लेकिन धरातल पर कोई ठोस सुरक्षा योजना नजर नहीं आ रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि वन विभाग द्वारा उठाए गए कदम इन हिंसक हमलों को रोकने के लिए नाकाफी साबित हो रहे हैं, जिससे आए दिन लोग अपनी जान गंवा रहे हैं।
पर्यावरण असंतुलन और संघर्ष के कारण
बिजनौर में गुलदारों के इस बढ़ते दखल के पीछे विशेषज्ञों ने जिम कॉर्बेट पार्क से जुड़े पारिस्थितिक तंत्र को कारण बताया है। जिम कॉर्बेट पार्क में बाघों की संख्या बढ़ने के कारण नर और मादा तेंदुए अब निचले मैदानी क्षेत्रों को अपना नया ठिकाना बना रहे हैं। बिजनौर में गन्ने की बड़े पैमाने पर खेती होती है, जो तेंदुओं को छिपने के लिए सुरक्षित आश्रय और भोजन दोनों प्रदान करती है। इन खेतों में उन्हें पानी के लिए नहरें और शिकार के रूप में सियार, जंगली सुअर तथा आवारा पशु आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। तेंदुओं की उच्च प्रजनन क्षमता ने भी उनकी संख्या बढ़ाने में योगदान दिया है, जिससे वे लगातार मानव बस्तियों की ओर बढ़ रहे हैं। यह असंतुलन अब बिजनौर के लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है और जब तक इनके प्राकृतिक आवास को लेकर कोई दीर्घकालिक समाधान नहीं निकलता, तब तक यह खौफ बना रहेगा।