अस्थायी ट्रस्टी के दान पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु में स्थित नागापालयम मरिअम्मन-पोनाचिअम्मन मंदिर की भूमि से संबंधित विवाद पर अपना निर्णय सुनाया है। मामला तमिलनाडु के इरोड क्षेत्र के कोडुमुडी गांव में मौजूद मंदिर की एक एकड़ से अधिक भूमि के मालिकाना हक को लेकर था। इस जमीन का प्रबंधन मंदिर ट्रस्ट द्वारा किया जाता रहा है। विवाद तब शुरू हुआ जब 30 अगस्त 2017 के दिन एक स्थानीय तहसीलदार ने आधिकारिक प्रमाणपत्र निर्गत किया। इस दस्तावेज में यह दावा किया गया कि मंदिर के कामकाज को अस्थायी रूप से संभालने वाले एस। भूपति ने पूरी जमीन सरकारी तंत्र को भेंट कर दी है। न्यायालय ने इस प्रक्रिया को अनुचित माना और स्पष्ट किया कि कोई भी अस्थायी प्रबंधनकर्ता मंदिर की अचल संपत्तियों को राज्य सरकार को उपहार स्वरूप नहीं सौंप सकता है। अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया है कि सरकार इन संपत्तियों की संरक्षक है न कि उनका स्वामी। इस निर्णय के साथ ही मंदिर की भूमि की रक्षा का एक मजबूत कानूनी मानक स्थापित हुआ है।
कानूनी चुनौती और सरकार की भूमिका पर सवाल
मंदिर की जमीन के इस अनधिकृत दान को लेकर पेरियासामी और तीन अन्य याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय में चुनौती दी थी। शीर्ष अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रदेश सरकार के रवैये पर कड़ी टिप्पणी की है। सरकार पर आरोप लगा है कि उसने मंदिर के संरक्षक की भूमिका निभाने के बजाय, इस अवैध दान को स्वीकार कर लिया। इतना ही नहीं, जब मामला उच्च न्यायालय और फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो राज्य सरकार ने इस दानपत्र का बचाव करने का कार्य किया। न्यायाधीशों ने अपने फैसले में जोर देकर कहा कि जिन धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन की जिम्मेदारी सरकार पर है, उनके हितों के खिलाफ कार्य करना पूर्णतः अस्वीकार्य है। कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि सरकार को मंदिर की संपत्ति के रक्षक के तौर पर व्यवहार करना चाहिए था, न कि दान लेने वाले के रूप में। राज्य के इस कार्य को अदालत ने अपने वैधानिक दायित्वों का उल्लंघन माना है और कड़े शब्दों में चेतावनी दी है।
न्यायालय का जुर्माना और भविष्य की दिशा
अदालत ने मंदिर की गरिमा और संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रदेश सरकार पर दंडात्मक कार्रवाई की है। न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि सरकार को आठ सप्ताह की समय-सीमा के भीतर मंदिर प्रबंधन को एक लाख रुपये का हर्जाना देना होगा। यह निर्णय धार्मिक संपत्तियों के संरक्षण के मामले में एक मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मंदिर की जमीनें किसी भी प्रकार के अवैध लेनदेन या राजनीतिक हस्तक्षेप से सुरक्षित रहें। भविष्य में किसी भी सरकारी अधिकारी द्वारा इस प्रकार के दान को स्वीकार करने की संभावनाओं पर भी रोक लग गई है। यह फैसला उन सभी श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जो मंदिर की जमीन को ईश्वर की धरोहर मानते हैं। अब सरकार के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि वह धार्मिक संस्थाओं की संपत्ति की सुरक्षा हेतु अधिक सतर्क और जवाबदेह बने। भविष्य में ट्रस्टी द्वारा मनमाने निर्णय लेने पर भी अब कानूनी अंकुश लग गया है।