देशभर की जल धाराओं में बढ़ता गंभीर प्रदूषण देशभर की भौगोलिक संरचना में अहम भूमिका निभाने वाली जल धाराओं का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा गंभीर प्रदूषण की चपेट में आ चुका है। विभिन्न सरकारी आंकड़ों और रिपोर्टों के मुताबिक इन प्राकृतिक स्रोतों को बचाने के लिए पिछले कई वर्षों के दौरान भारी भरकम बजट आवंटित किया गया और करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए गए। इसके बावजूद मैदानी इलाकों से लेकर शहरी सीमाओं तक बहने वाली इन नदियों का संकट जस का तस बना हुआ है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जैसे ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण क्षेत्र में भी स्थानीय जल स्रोतों की हालत बेहद दयनीय हो चुकी है। सीवेज का सीधे नदियों में गिरना और औद्योगिक कचरे का बेहिसाब निस्तारण इस स्थिति को और अधिक भयावह बना रहा है। प्रशासन द्वारा समय-समय पर सफाई अभियानों के दावे किए जाते हैं, परंतु धरातल पर योजनाएं पूरी तरह से दम तोड़ती नजर आ रही हैं। गोरखपुर की स्थानीय नदियां अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं और आसपास के इलाकों में रहने वाले आम नागरिकों को इसके दुष्परिणामों का सामना करना पड़ रहा है।
करोड़ों का बजट खर्च होने के बाद भी बरकरार संकट नदियों के जीर्णोद्धार और उनके संरक्षण के नाम पर केंद्रीय तथा राज्य स्तर पर विभिन्न योजनाएं चलाई जाती हैं जिनके तहत हर साल भारी बजट स्वीकृत होता है। जल संरक्षण विशेषज्ञों का मानना है कि योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता की कमी और प्रशासनिक इच्छाशक्ति का अभाव इन विफलताओं का मुख्य कारण है। गोरखपुर सहित प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट यानी एसटीपी की क्षमता या तो कम है या फिर कई स्थानों पर वे चालू हालत में नहीं हैं। इस वजह से शहर का गंदा पानी बिना किसी उचित शोधन के सीधे नदियों में प्रवाहित कर दिया जाता है। इसके अलावा जल स्रोतों के दोनों किनारों पर होने वाले अवैध अतिक्रमण ने नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को पूरी तरह से बाधित कर दिया है। जब तक जल प्रबंधन से जुड़े विभागों में जवाबदेही तय नहीं की जाएगी और स्थानीय नागरिकों को इस अभियान से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक केवल कागजी योजनाओं से स्थिति में कोई भी सकारात्मक बदलाव आना असंभव प्रतीत होता है। जनता के खून-पसीने की कमाई का पैसा कागजों पर तो खर्च होता है, लेकिन जमीन पर उसका कोई ठोस परिणाम दिखाई नहीं देता है।
पर्यावरणीय संतुलन पर खतरा और भविष्य की चुनौतियां नदियों के दूषित होने का सीधा असर भूजल स्तर, कृषि उपज और आम जनमानस के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है जो कि आने वाले समय के लिए एक बड़ी चेतावनी है। गोरखपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में भूमिगत जल भी इस प्रदूषण की वजह से जहरीला होता जा रहा है जिससे गंभीर बीमारियां फैलने का अंदेशा बना रहता है। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि इस दिशा में तुरंत और सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को पेयजल की भारी किल्लत का सामना करना पड़ेगा। स्थानीय प्रशासन और नगर निगम के अधिकारियों पर अब यह दबाव बढ़ रहा है कि वे अपनी कार्यप्रणाली में सुधार लाएं और भ्रष्टाचार पर लगाम कसें। आने वाले दिनों में यदि इन जल स्रोतों की सफाई के लिए कोई कारगर और दीर्घकालिक नीति नहीं बनाई गई, तो जन आंदोलन भड़कने की पूरी संभावना है। सरकार और संबंधित महकमों को अब दिखावे की बैठकों से बाहर निकलकर धरातल पर उतरना होगा ताकि देश की इन जीवनदायिनी नदियों को पूरी तरह से नष्ट होने से बचाया जा सके।