जेल में आजीवन कारावास काट रहा कैदी
गोरखपुर जिला जेल में बंद 72 वर्षीय कैदी परवेज परवाज की मृत्यु हो गई है। वह तुर्कमानपुर निवासी था और राजघाट थाना क्षेत्र के अंतर्गत आता था। परवेज परवाज पिछले करीब आठ वर्षों से सलाखों के पीछे था। वह मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी विभिन्न गंभीर बीमारियों से लंबे समय से पीड़ित था। बीते दिन उसकी शारीरिक स्थिति अचानक काफी बिगड़ गई थी। कारागार प्रशासन ने उसे तत्काल उपचार के लिए जिला अस्पताल पहुंचाया था। चिकित्सकीय प्रयासों के बावजूद उसकी हालत में सुधार नहीं हुआ और देर रात उसकी मौत की पुष्टि की गई। उसे एक दुष्कर्म के मामले में अदालत द्वारा आजीवन सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी। जेल प्रशासन ने हाल ही में उसकी आंखों का ऑपरेशन भी करवाया था ताकि उसे राहत मिल सके। परवेज परवाज की मृत्यु के बाद कानूनी प्रक्रिया पूरी की जा रही है और उसके शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है।
दुष्कर्म मामले में सजा और जुर्माने का विवरण
जून 2018 में एक महिला ने परवेज परवाज और महमूद उर्फ जुम्मन बाबा पर गंभीर आरोप लगाए थे। महिला ने शिकायत में कहा था कि पति से मनमुटाव के दौरान वह मगहर मस्जिद में झाड़-फूंक के लिए जाती थी। वहीं उसकी मुलाकात जुम्मन बाबा से हुई थी। आरोप था कि 3 जून 2018 को जुम्मन बाबा ने उसे पांडेयहाता स्थित एक दुकान के पास बुलाया। वहां परवेज परवाज भी मौजूद था और दोनों ने रिवाल्वर के बल पर उसे सुनसान जगह ले जाकर दुष्कर्म किया। जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने सुनवाई पूरी करने के बाद दोनों को दोषी करार दिया था। उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाते हुए 25-25 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया था। अदालत ने पीड़िता के पुनर्वास हेतु 40 हजार रुपये देने के निर्देश दिए थे। जुर्माना न भरने पर एक-एक साल की अतिरिक्त कैद का प्रावधान किया गया था। इस मामले में परवेज के साथी जुम्मन बाबा की मौत भी सजा काटने के दौरान पहले ही हो चुकी है।
राजनीतिक मुकदमे और पुरानी कानूनी पृष्ठभूमि
परवेज परवाज का नाम वर्ष 2007 में गोरखपुर दंगा मामले के कारण सुर्खियों में आया था। उस समय उसने तत्कालीन सांसद और वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित कई लोगों पर मामला दर्ज कराया था। उसने धार्मिक उन्माद फैलाने का आरोप लगाया था और अदालत का दरवाजा खटखटाया था। इस मामले के साक्ष्यों में शामिल सीडी की जांच में छेड़छाड़ के संकेत मिले थे। इसके बाद परवेज परवाज के खिलाफ स्वयं भी कानूनी मुकदमा दर्ज किया गया था। दंगों के दौरान उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी रासुका जैसी सख्त कार्रवाई भी की गई थी। उस मामले में उसने लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़ी थी और बाद में संबंधित प्रकरण में अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दी गई थी। परवेज की उम्र और उसकी बीमारियों को देखते हुए उसका जेल जीवन चुनौतीपूर्ण रहा था। आज उसकी मृत्यु के साथ ही उस पुराने चर्चित प्रकरण से जुड़ा एक और अध्याय कानूनी रूप से समाप्त हो गया है।