दिल्ली एनसीआर में फुटओवर ब्रिज की खराब हालत
दिल्ली एनसीआर क्षेत्र से सामने आई इस ताजा घटना ने सार्वजनिक निर्माण कार्यों की पोल खोलकर रख दी है। इलाके में पैदल चलने वालों की सुविधा और सुरक्षा के लिए बनाए गए एक नए फुटओवर ब्रिज का बुरा हाल हो गया है। इस पुल पर लगाई गई टाइल्स महज तीन महीने की छोटी अवधि के भीतर ही अपनी जगह छोड़ने लगी हैं। राहगीरों का कहना है कि इतने कम समय में टाइल्स का उखड़ना किसी बड़े भ्रष्टाचार या भारी लापरवाही की ओर स्पष्ट इशारा करता है। पैदल यात्रियों को इस पुल से गुजरने में अब काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि कई जगह पर टाइल्स गायब हैं और सतह असमान हो चुकी है। इस मार्ग का उपयोग करने वाले दैनिक यात्रियों ने प्रशासन और संबंधित निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है। उनका कहना है कि सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये खर्च करके बनाए जाने वाले ऐसे ढांचे कुछ ही हफ्तों में क्यों जर्जर होने लगते हैं। निर्माण कार्य पूरा होने के तुरंत बाद इस तरह का नुकसान होना अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत पर भी कई तरह के गंभीर संदेह पैदा करता है।
निर्माण की गुणवत्ता पर स्थानीय लोगों का आक्रोश
फुटओवर ब्रिज की खस्ता हालत को देखकर रोजाना सफर करने वाले आम लोगों और स्थानीय निवासियों में भारी गुस्सा फूट पड़ा है। लोगों का स्पष्ट तौर पर कहना है कि निर्माण के दौरान तय मानकों और गुणवत्ता का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखा गया है। ठेकेदारों ने केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया है जिसके कारण यह स्थिति पैदा हुई है। स्थानीय दुकानदारों और निवासियों ने मिलकर इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने की पुरजोर मांग उठाई है। उनका कहना है कि यदि शुरुआती दौर में ही इस तरह की लापरवाही पर रोक नहीं लगाई गई तो आने वाले दिनों में यह पुल किसी बड़े हादसे का कारण भी बन सकता है। अभी तक किसी भी जिम्मेदार सरकारी अधिकारी या निर्माण एजेंसी के प्रतिनिधि की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लोग लगातार सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से इस टूटे हुए पुल की तस्वीरें साझा कर रहे हैं और संबंधित विभाग के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। इस तरह के मामलों से जनता का सरकारी विकास कार्यों पर से भरोसा तेजी से उठ रहा है और लोग अब खुलकर सवाल पूछने लगे हैं।
सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और जवाबदेही की पृष्ठभूमि
शहरी इलाकों में पैदल चलने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए फुटओवर ब्रिज जैसे बुनियादी ढांचे का निर्माण बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। सरकार और स्थानीय निकाय हर साल जनता के करों के पैसों से इन संरचनाओं को खड़ा करने पर बड़ा बजट खर्च करते हैं। इसके बावजूद देखरेख के अभाव और घटिया निर्माण सामग्री के कारण ये परियोजनाएं बहुत जल्द अपनी उपयोगिता खोने लगती हैं। इस प्रकार की घटनाएं इस बात का जीता जागता उदाहरण हैं कि निर्माण कार्यों के दौरान ठेकेदारों पर निगरानी रखने वाला तंत्र पूरी तरह से विफल साबित हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक कार्यों में पारदर्शिता नहीं लाई जाएगी और दोषी ठेकेदारों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक स्थिति में सुधार होना नामुमकिन है। आने वाले दिनों में स्थानीय लोगों का यह गुस्सा और अधिक उग्र हो सकता है यदि प्रशासन ने समय रहते इस पुल की मरम्मत नहीं करवाई। जनता अब यह उम्मीद लगाए बैठी है कि संबंधित विभाग जल्द ही इस मामले का संज्ञान लेगा और दोषी अधिकारियों के खिलाफ जवाबदेही तय की जाएगी ताकि भविष्य में इस तरह की लापरवाही को दोबारा होने से रोका जा सके।