पुस्तक लोकार्पण समारोह का आयोजन
भारतीय संस्कृति और प्राचीन परंपराओं के विकास पर आधारित एक साहित्यिक कृति का रविवार को सार्वजनिक रूप से अनावरण किया गया। यह कार्यक्रम सारनाथ के भीतर स्थित उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के बड़े सभागार में संपन्न हुआ। इस विशेष अवसर पर लेखक इंदीवर द्वारा रचित उपन्यास देववंशज को पाठकों के सामने लाया गया। पुस्तक के आने के बाद संस्थान के परिसर में एक परिसंवाद का भी आयोजन किया गया जिसमें तमाम बुद्धिजीवियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम की शुरुआत स्वागत भाषण से हुई जिसे तिब्बती संस्थान की कुलसचिव डॉ। सुनीता चंद्रा ने प्रस्तुत किया। इसके बाद पूरे आयोजन की रूपरेखा और संचालन नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने संभाली। अंत में कार्यक्रम के समापन पर सभी का आभार जताने का कार्य डॉ। उमेश प्रसाद सिंह ने किया। इस साहित्यिक आयोजन में उत्तर प्रदेश सरकार के राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार डॉ। दयाशंकर मिश्र दयालु ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इसके अलावा वाराणसी के महापौर अशोक तिवारी और विधान परिषद सदस्य धर्मेंद्र सिंह ने भी इस गरिमामयी समारोह की शोभा बढ़ाई। वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा के साथ ही डॉ। दयानिधि मिश्र, नरेंद्रनाथ मिश्र और हिमांशु उपाध्याय जैसे प्रबुद्ध नागरिक भी इस पुस्तक लोकार्पण के दौरान मंच और सभागार में प्रमुख रूप से मौजूद रहे।
विद्वानों द्वारा उपन्यास पर चर्चा
उपन्यास के विमोचन के तुरंत बाद इस पर एक विस्तृत बौद्धिक चर्चा की शुरुआत की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे असोम के राज्यपाल लक्ष्मण आचार्य ने अपने संबोधन में बताया कि यह कृति प्राचीन वेदों और पुराणों की कथाओं के सहारे देश की साझा संस्कृति का परिचय देती है। उन्होंने आगे कहा कि यह रचना राष्ट्रीय एकता और सबकी सहभागिता का मजबूत संदेश समाज तक पहुंचाती है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर अजित कुमार चतुर्वेदी ने इस बात पर प्रकाश डाला कि लेखक ने रचना के भीतर कई दार्शनिक प्रश्नों को उठाया है। उनके अनुसार आर्य और द्रविड़ के बीच के संवाद के अलावा देव और असुर की श्रेष्ठता जैसे विषयों को भी इसमें शामिल किया गया है। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रोफेसर आनंद कुमार त्यागी ने बताया कि यह पुस्तक आम जनता के लिए तैयार की गई है जो पाठकों को चिंतनशील बनाती है। तिब्बती संस्थान के कुलपति प्रोफेसर वांगचुक दोर्जी नेगी ने इस बात पर जोर दिया कि यह रचना महात्मा बुद्ध के काल से भी बहुत पहले के इतिहास को उजागर करती है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि पुरातत्व से मिलने वाले अवशेषों और पुराणों के अध्ययन को एक साथ जोड़कर व्यापक शोध किया जाना चाहिए। इस चर्चा के दौरान बलिराज पांडेय, प्रोफेसर ओमप्रकाश सिंह और प्रोफेसर सुरेंद्र प्रताप ने भी अपने महत्वपूर्ण विचार सबके सामने रखे और उपन्यास की खूबियों पर प्रकाश डाला।
लेखक की दृष्टि और सांस्कृतिक महत्व
अपनी इस नई कृति के बारे में विस्तार से बात करते हुए लेखक डॉ। इंदीवर ने बताया कि उनकी यह कहानी मुख्य रूप से चार विशेष चरित्रों के इर्द-गिर्द घूमती है। इन प्रमुख चरित्रों में इंद्र, पृथु, दक्ष और मनु शामिल हैं जिनके माध्यम से पूरी कथा को गढ़ा गया है। उन्होंने बताया कि उस प्राचीन काल में देवता पृथ्वी पर ही निवास करते थे और उनका मुख्य भोजन नीवार, चावल तथा जौ हुआ करता था। वे लोग प्राकृतिक वातावरण में झोपड़ों के भीतर रहते थे और पर्वतीय क्षेत्रों में विचरण करते थे जबकि असुर तकनीक के मामले में काफी आगे थे। उस समय गंधर्वों, किन्नरों और नागों के साथ भी गहरे सौहार्दपूर्ण संबंध हुआ करते थे जो इस कथा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। लेखक ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रलय जैसी बड़ी आपदा आने के बाद भी हमारी यह प्राचीन परंपरा नष्ट नहीं हुई बल्कि जीवित बची रही। ईसा मसीह के जन्म से लगभग 6 हजार वर्ष पूर्व की सभ्यताओं के बीच आपसी मेलजोल को इस उपन्यास का मुख्य जीवन दर्शन बताया गया है। इस प्रकार यह पूरी रचना प्राचीन इतिहास, मिथकों और मानवीय सभ्यता के विकास क्रम को आधुनिक दृष्टिकोण से जोड़ने का एक अनूठा और सार्थक प्रयास साबित होती है जो आने वाले समय में पाठकों को गहराई से प्रभावित करेगी।