लैंड पूलिंग और भूमि उपयोग पर सवाल
बिहार में विकसित की जा रही सैटेलाइट टाउनशिप योजनाओं के खिलाफ राज्य के विभिन्न किसान संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है। सात अक्टूबर को आयोजित एक कार्यक्रम में इन संगठनों ने स्पष्ट किया कि उन्हें विकास के नाम पर अपनी उपजाऊ कृषि भूमि की बलि देना कतई स्वीकार नहीं है। संगठनों ने लैंड पूलिंग की मौजूदा नीति की आलोचना करते हुए कहा कि किसानों को जमीन के बदले जो विकसित भूखंड मिलेंगे, उनकी गुणवत्ता और स्थान का निर्धारण किस प्रकार होगा, इसे लेकर भारी अनिश्चितता बनी हुई है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भूमि के भविष्य में बढ़ने वाले बाजार मूल्यों का उचित लाभ मूल भू-स्वामियों को मिलना चाहिए। किसान प्रतिनिधि चाहते हैं कि विकास की पूरी प्रक्रिया में उन्हें मात्र दर्शक नहीं, बल्कि वास्तविक साझेदार बनाया जाए। इसके अतिरिक्त, टाउनशिप के लिए प्रस्तावित भूमि उपयोग अनुपात को लेकर भी गहरी चिंताएं जताई गई हैं, जिसमें सड़क, बिक्री योग्य भूखंड और सुविधाओं के लिए निर्धारित क्षेत्र को लेकर स्पष्टता की कमी महसूस की जा रही है।
मुआवजा नीति और प्रशासनिक जवाबदेही
किसान संगठनों ने बिहार सिटी डेवलपमेंट अथॉरिटी की कार्यप्रणाली पर भी कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि जिस निकाय को शहरी नियोजन और भूमि उपयोग जैसे महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त हैं, उसमें किसानों, स्थानीय जनता, निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और निष्पक्ष विशेषज्ञों की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। संगठन चाहते हैं कि सार्वजनिक जवाबदेही के बिना लिए गए फैसले ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर सकते हैं। उन्होंने मांग की है कि किसी भी परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण शुरू करने से पहले विस्तृत सामाजिक प्रभाव आकलन और सामाजिक ऑडिट अनिवार्य किया जाना चाहिए। इससे यह पता चल पाएगा कि खेती पर निर्भर रहने वाले कितने परिवारों, खेतिहर मजदूरों और स्थानीय व्यापारियों की जीविका पर कितना दुष्प्रभाव पड़ेगा। सिंचाई संसाधनों, जल निकायों और स्थानीय बाजारों पर होने वाले असर का भी वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक है। संगठन केवल मुआवजे के फार्मूले को ही नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था को पारदर्शी देखना चाहते हैं जो उनके भविष्य की नियमित आय को प्रभावित करने वाली है।
आधुनिक विकास और किसान संगठनों की मांग
आधुनिक बिहार के विकास का पैमाना केवल बड़े-बड़े रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स को नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि इसके केंद्र में गांव और कृषि होनी चाहिए। किसान संगठनों ने जोर देकर कहा है कि भविष्य का विकास स्मार्ट गांव, बेहतर सिंचाई सुविधाओं, कृषि आधारित उद्योगों और ग्रामीण शिक्षा व स्वास्थ्य के ढांचे पर टिका होना चाहिए। उन्होंने बिहार सिटी डेवलपमेंट एक्ट 2026 को तुरंत वापस लेने की मांग की है क्योंकि उन्हें डर है कि कृषि भूमि के तेजी से शहरीकरण से ग्रामीण जीवन का आधार नष्ट हो जाएगा। संगठनों ने स्पष्ट संदेश दिया है कि सरकार को वर्ष 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून यानी आरएफसीटीएलएआरआर एक्ट के किसान हितैषी प्रावधानों को पूरी तरह से सुरक्षित रखना चाहिए। वे चाहते हैं कि सरकार रियल एस्टेट के प्रति मोह त्यागकर स्थानीय रोजगार और ग्रामीण समृद्धि को प्राथमिकता दे। जब तक इन सभी मांगों पर ठोस नीतिगत निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक कृषि भूमि को शहरी परियोजनाओं के दायरे में लाने का विरोध जारी रहेगा।