दिवंगत लोक कलाकारों के परिजनों का हुआ सम्मान
उत्तराखंड की माटी के प्रसिद्ध और अब हमारे बीच नहीं रहे लोक कलाकारों की याद में आयोजित होने वाले विशेष कार्यक्रम के दूसरे दिन उनके परिवारों को मंच पर आमंत्रित किया गया। आवाज सुनो पहाड़ों की नामक संस्था के माध्यम से यह तीन दिवसीय अनुष्ठान चलाया जा रहा है। इस मौके पर दिवंगत विभूतियों के परिजनों को स्मृति चिन्ह और सम्मान भेंट कर उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। संस्था का यह प्रयास पिछले तीन सालों से लगातार जारी है ताकि नई पीढ़ी उन महान हस्तियों के योगदान को भली-भांति जान सके। जब आयोजकों द्वारा परिजनों का सम्मान किया जा रहा था, तब पूरा सभागार भावनाओं से भर गया और वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। उपस्थित दर्शकों और कलाकारों ने अपने-अपने इलाकों के लोकपितरों को याद करते हुए उन्हें नमन किया। इस अवसर पर पारंपरिक लोक गीतों की एक के बाद एक कई शानदार प्रस्तुतियां दी गईं, जिसने पूरे आयोजन के माहौल को बेहद संवेदनशील और सांस्कृतिक बना दिया। इन दिवंगत कलाकारों ने अपना पूरा जीवन पहाड़ों की संस्कृति, लोक कलाओं और रीति-रिवाजों को बचाने तथा आगे बढ़ाने में ही गुजार दिया था।
दिग्गज नेताओं और कलाकारों ने की विचार-गोष्ठी
समारोह के दौरान एक बड़ी बैठक और चर्चा का भी आयोजन किया गया जिसमें प्रदेश के कई जाने-माने राजनेता और दिग्गज कलाकार शामिल हुए। इस उच्चस्तरीय चर्चा में कैबिनेट मंत्री भारत सिंह चौधरी और हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र से सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने विशेष रूप से शिरकत की। उनके अलावा लोक जगत के प्रतिष्ठित नाम जैसे संतोष खेतवाल, जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण, वरिष्ठ गायक वीरेंद्र डंगवाल और गायिका हेमा करासी ने भी अपने विचार रखे। उत्तराखंड के कोने-कोने से बड़ी संख्या में पहुंचे अन्य कलाकारों ने भी इस बौद्धिक मंथन में सक्रिय रूप से भाग लिया। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में इस बात पर जोर दिया कि लोक संस्कृति का दायरा केवल बड़े मंचों पर प्रस्तुतियां देने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। इसकी असली जड़ें हमारे गांवों की गलियों और खेतों में बसती हैं। पलायन की समस्या के कारण आज गांवों का पारंपरिक लोक परंपराओं से और वहां के कलाकारों का अपनी भूमि से लगातार मोहभंग हो रहा है और जुड़ाव कमजोर पड़ रहा है। वक्ताओं ने सुझाव दिया कि यदि कलाकारों को उनके अपने ही गांव और ब्लॉक स्तर पर कला प्रदर्शन के नियमित मौके मिल जाएं, तो वे अपनी आजीविका सुरक्षित कर सकेंगे।
पलायन रोकने और रोजगार सृजन पर हुआ मंथन
ग्राम स्तर पर लोक कलाकारों के लिए रोजगार के नए और पुख्ता अवसर विकसित करने पर इस पूरे कार्यक्रम के दौरान सबसे अधिक मंथन किया गया। आयोजकों और मंच के प्रतिनिधियों ने साफ शब्दों में कहा कि यदि कलाकारों को स्थानीय स्तर पर ही सम्मानजनक आजीविका और काम मिल जाए, तो उन्हें मजबूरी में रोजी-रोटी की तलाश में अपने पुश्तैनी गांव छोड़कर शहरों की तरफ नहीं भागना पड़ेगा। इस प्रकार की व्यवस्था से पहाड़ों से होने वाले निरंतर पलायन को थामने में बहुत बड़ी मदद मिल सकती है। साथ ही हमारी पारंपरिक और प्राचीन लोक संस्कृति भी अपनी मूल जड़ों के साथ सुरक्षित बनी रहेगी। इस मुहिम की सफलता के लिए सभी ने सामूहिक प्रयास करने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। कार्यक्रम में मौजूद अतिथियों और कलाकारों ने आवाज सुनो पहाड़ों की मंच के इस अनूठे प्रयास की खुलकर सराहना की और अपना पूरा समर्थन देने का ऐलान किया। लोकपितृ स्मरण समारोह का यह भव्य आयोजन कल अपने अंतिम चरण में प्रवेश करेगा और आखिरी दिन भी कई कार्यक्रम होंगे। कल दोपहर 12 बजे से लेकर रात 8 बजे तक विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी जाएंगी, जिसमें लोक गीतों का विशेष कार्यक्रम भी शामिल रहेगा।