वर्तमान वित्तीय वर्ष में शून्य रुचि
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित शहीद अशफाक उल्ला खां प्राणि उद्यान में जानवरों के रखरखवाव को लेकर एक बड़ी चुनौती सामने आई है। इस चालू वर्ष के दौरान अभी तक किसी भी आम नागरिक अथवा किसी संगठन ने एक भी जीव को गोद लेने के लिए आगे कदम नहीं बढ़ाया है। स्थिति यह है कि प्राणियों के भोजन और देखभाल का सारा वित्तीय बोझ पूरी तरह से सीधे तौर पर चिड़ियाघर प्रशासन के कंधों पर आ गया है। इस योजना के तहत गोद लेने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति या संस्था को संबंधित वन्यजीव के तयशुदा भोजन का खर्च उठाना पड़ता है। प्रशासनिक देखरेख में चलने वाले इस उद्यान में इस बार सन्नाटा पसरा हुआ है क्योंकि किसी भी तरफ से कोई प्रस्ताव या आवेदन नहीं मिला है। पूर्व के वर्षों में कुछ लोग आगे आए थे लेकिन इस बार लगातार उदासीनता का माहौल बना हुआ है। इससे प्रशासन को अपने संसाधनों से ही सभी जानवरों की दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करना पड़ रहा है जो कि एक बड़ा आर्थिक दबाव बनता जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक इस योजना के जरिए मिलने वाले सहयोग से वन्यजीवों के प्रबंधन में काफी सहायता मिलती थी लेकिन इस बार ऐसा कोई समर्थन नहीं मिल पा रहा है।
आवेदन और राशि जमा करने की व्यवस्था
जानवरों को अपने संरक्षण में लेने की पूरी प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है जिसके तहत इच्छुक व्यक्ति को लिखित आवेदन देना होता है। आवेदन पत्र में यह साफ उल्लेख करना अनिवार्य होता है कि आवेदक किस विशिष्ट जानवर को किस निश्चित समयावधि के लिए गोद लेना चाहता है। इसके बाद तय की गई कुल धनराशि को शहीद अशफाक उल्ला खां प्राणि उद्यान गोरखपुर सोसाइटी के आधिकारिक खाते में जमा करना होता है। भुगतान करने के लिए चेक, बैंक ड्राफ्ट या फिर आरटीजीएस माध्यम का उपयोग किया जा सकता है। सोसाइटी के खाते में पैसा पहुंचने के पूरे दस दिन बाद वह गोद लेने की योजना आधिकारिक रूप से लागू मानी जाती है। इस समयावधि के दौरान नियमों के मुताबिक दानकर्ताओं को विशेष टिकट भी प्रदान किए जाते हैं जिनमें तीन महीने के लिए छह टिकट, छह महीने के लिए बारह टिकट और पूरे एक वर्ष के लिए अट्ठारह विशेष टिकट शामिल हैं। इसके अलावा जिस अवधि तक कोई व्यक्ति किसी जीव को गोद लेता है, ठीक उसी समयावधि तक उस जानवर के बाड़े के बाहर उस व्यक्ति या संस्था का नाम बड़े डिस्प्ले पर प्रदर्शित किया जाता है। साथ ही चिड़ियाघर प्रबंधन की तरफ से ऐसे मददगारों को एक औपचारिक प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित भी किया जाता है जिससे लोगों का उत्साहवर्धन हो सके।
विभिन्न जीवों के भोजन पर आने वाला खर्च
प्राणि उद्यान में रहने वाले अलग-अलग वन्यजीवों के खानपान पर प्रतिदिन का खर्च भी काफी भिन्न है जो उनके आकार और प्रजाति पर निर्भर करता है। आंकड़ों के अनुसार सबसे अधिक खर्च बाघ या बब्बर शेर पर आता है जिसके एक दिन के भोजन पर 2301 रुपये खर्च होते हैं। इसके विपरीत सबसे कम खर्च मोर पर आता है जिसका दैनिक आहार मूल्य मात्र 49 रुपये है। अन्य जीवों की बात करें तो तेंदुआ या लकड़बग्घा पर 753 रुपये, भेड़िया पर 551 रुपये और गैंडा तथा दरियाई घोड़ा पर 849 रुपये प्रतिदिन खर्च किए जाते हैं। बारहसिंगा या सांबर के लिए 166 रुपये, चीतल, पाढ़ा, काकड़ व काला हिरण के लिए 95 रुपये का दैनिक खर्च निर्धारित है। सियार और जंगली बिल्ली पर 252 रुपये, लोमड़ी पर 126 रुपये, जेब्रा पर 644 रुपये तथा बंदर पर 82 रुपये खर्च होते हैं। भालू के भोजन पर 589 रुपये, सेही पर 63 रुपये, दस काकाटील पक्षियों पर 66 रुपये और दस देशी तोतों पर 99 रुपये रोजाना खर्च आते हैं। इसके अतिरिक्त कछुआ घर के लिए 219 रुपये, मगरमच्छ पांड के लिए 548 रुपये और घड़ियाल पांड के लिए प्रतिदिन 110 रुपये का खर्च तय किया गया है। पिछले वर्षों में नवनीत जिंदल, विमलेश पासवान, रचना धुलिया, खुशबू मोदी, श्वेता अग्रवाल, रोटरी यूफोरिया, एआरसी स्केच डिजाइन एंड प्लानर और अंकिता सिंह जैसे नाम इस नेक कार्य से जुड़े थे।