न्यायालय में पुलिस का प्रार्थना पत्र खारिज
गोरखपुर शहर के शास्त्री चौक पर स्थित प्रेस क्लब सभागार के भीतर बीते तीन अक्टूबर को समाजवादी पार्टी के नेताओं के गुटों के बीच तीखी झड़प और मारपीट की घटना सामने आई थी। इस हाई-प्रोफाइल मामले में नामजद और फरार चल रहे आरोपियों की गिरफ्तारी सुनिश्चित करने के वास्ते पुलिस महकमा हरकत में आया था। कैंट थाने के वरिष्ठ उपनिरीक्षक विनोद सिंह ने अदालत की शरण लेते हुए पूर्व चेयरमैन अंशुमान सिंह तथा उनके दोनों पुत्रों कमलेश और विमलेश के विरुद्ध गैर जमानती वारंट जारी कराने का औपचारिक अनुरोध किया था। इस संबंध में उन्होंने न्यायालय के समक्ष एक विशेष प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया था जिस पर गंभीरता से सुनवाई की गई। हालांकि, अदालत ने पुलिस के इस आग्रह को स्वीकार करने से स्पष्ट इनकार कर दिया और प्रार्थना पत्र को आधिकारिक रूप से खारिज कर दिया। अदालत का मानना है कि इस स्तर पर वारंट जारी करने के बजाय मामले से जुड़े अन्य पहलुओं और तथ्यों को खंगालने की आवश्यकता है। इस न्यायिक निर्णय के बाद फिलहाल पुलिस प्रशासन को आरोपियों की धरपकड़ के मोर्चे पर किसी भी प्रकार की राहत मिलती हुई नजर नहीं आ रही है। स्थानीय पुलिस अधिकारियों के लिए यह एक बड़ा झटका माना जा रहा है क्योंकि वे इस मामले में तेजी से कानूनी शिकंजा कसने की फिराक में थे। अदालत के रुख को देखते हुए अब जांच अधिकारियों को अपनी रणनीति में बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है ताकि आरोपियों के खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाए जा सकें।
साक्ष्य जुटाने के निर्देश और वीडियो फुटेज की जांच
अदालत की ओर से प्रार्थना पत्र खारिज किए जाने के बाद अब विवेचना अधिकारी यानी विवेचक की जिम्मेदारी काफी बढ़ गई है। न्यायाधीश ने स्पष्ट निर्देश जारी करते हुए कहा है कि पुलिस को सबसे पहले इस पूरे प्रकरण में ठोस साक्ष्य एकत्र करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अदालत के इस आदेश के अनुपालन में पुलिस दल अब मौके पर मौजूद रहे विभिन्न वीडियो फुटेज और अन्य तकनीकी सबूतों की बारीकी से जांच-पड़ताल कर रहा है। तीन अक्टूबर को घटी इस घटना के समय प्रेस क्लब सभागार के भीतर क्या कुछ हुआ था, इसका पूरा ब्यौरा खंगाला जा रहा है। सपा जिलाध्यक्ष बृजेश गौतम की ओर से आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान कुर्सियों पर बैठने को लेकर मामूली सी बात पर विवाद खड़ा हो गया था। देखते ही देखते यह तनातनी इतनी बढ़ गई कि दोनों पक्षों के लोग आपस में भिड़ गए और सभागार में जमकर मारपीट हुई। इस हंगामे के दौरान वहां अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया था जिसे नियंत्रित करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। अब पुलिस इन्हीं तमाम पहलुओं को ध्यान में रखते हुए वीडियो साक्ष्यों का मिलान कर रही है ताकि अदालत के समक्ष मजबूत चार्जशीट पेश की जा सके। सीओ कैंट अरुण कुमार एस ने इस पूरे घटनाक्रम पर मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि पुलिस पूरी तरह से पेशेवर तरीके से काम कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उपलब्ध कराए जाने वाले तमाम साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर ही इस मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई को तेजी से अंजाम दिया जाएगा।
हत्या के प्रयास और बलवा का मामला दर्ज
इस सनसनीखेज मारपीट की घटना के तूल पकड़ने के बाद कैंट थाने में ताबड़तोड़ कई कानूनी मुकदमे दर्ज किए गए थे। पूर्व सपा जिलाध्यक्ष नगीना प्रसाद साहनी ने इस मामले में एक औपचारिक तहरीर दी थी जिसके आधार पर पुलिस ने कठोर धाराओं में मुकदमा पंजीकृत किया था। इस प्राथमिकी में अंशुमान सिंह, उनके दोनों बेटों और अन्य अज्ञात सहयोगियों को नामजद किया गया था। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार आरोपियों के खिलाफ हत्या की कोशिश, मारपीट करने, जान से मारने की धमकी देने तथा बलवा फैलाने जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। पुलिस महकमे के उच्चाधिकारियों का कहना है कि मुख्य आरोपित अंशुमान सिंह और उनके दोनों पुत्र अभी भी कानून की गिरफ्त से पूरी तरह बाहर चल रहे हैं। उनकी तलाश में लगातार विभिन्न संभावित ठिकानों पर दबिश दी जा रही है लेकिन उनका सुराग नहीं मिल पा रहा है। सिर्फ इतना ही नहीं, इसी विवादित घटना को लेकर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब के अध्यक्ष की तरफ से भी एक अलग तहरीर दी गई थी। उस तहरीर के आधार पर भी कैंट थाने में एक अन्य मुकदमा दर्ज किया गया है जिसमें निवर्तमान जिलाध्यक्ष, महानगर अध्यक्ष, एक पूर्व मंत्री और एक पूर्व विधायक समेत कुल 12 सपा नेताओं के नाम शामिल हैं। इतने सारे नेताओं के नाम आने से यह पूरा प्रकरण राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का मुख्य विषय बन गया है। पुलिस अब दोनों पक्षों से जुड़े मामलों की समानांतर जांच कर रही है ताकि सच्चाई सामने आ सके।