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यूपी में पंचायत प्रशासकों के मानदेय पर क्यों उठे सवाल? जानिए पूरा मामला

ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म होने के बाद संभाली गई पंचायतों की जिम्मेदारी, लेकिन प्रधान वाला मानदेय मिलने पर स्थिति साफ नहीं

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Administrator
13 अग 2026, 13:44
यूपी में पंचायत प्रशासकों के मानदेय पर क्यों उठे सवाल? जानिए पूरा मामला

Lucknow Desk : उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म होने के बाद कई ग्राम पंचायतों में अब प्रशासकों के जरिए कामकाज चलाया जा रहा है। इसी बीच प्रशासकों को मिलने वाले मानदेय को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। शासन स्तर से सामने आ रही जानकारी के मुताबिक, ग्राम पंचायत प्रशासकों को ग्राम प्रधान का दर्जा नहीं दिया जा सकता। ऐसे में उन्हें ग्राम प्रधान के लिए निर्धारित मानदेय भी स्वतः नहीं मिलेगा। दरअसल, ग्राम प्रधान एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि होता है। उसे गांव की जनता चुनाव के जरिए चुनती है और उसका कार्यकाल तय होता है। वहीं, कार्यकाल समाप्त होने के बाद पंचायत का कामकाज चलाने के लिए प्रशासक की व्यवस्था की जाती है। प्रशासक का काम पंचायत की प्रशासनिक गतिविधियों और जरूरी कार्यों को आगे बढ़ाना होता है, लेकिन इससे वह ग्राम प्रधान के पद पर नहीं आ जाता। उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों के लिए पांच हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय का प्रावधान बताया जाता है। इसके अलावा ब्लॉक प्रमुख को 11,300 रुपये और जिला पंचायत अध्यक्ष को 15,500 रुपये प्रतिमाह मानदेय मिलता है।

ये व्यवस्थाएं निर्वाचित पदाधिकारियों से जुड़ी हैं। इसलिए पंचायतों में प्रशासकों की नियुक्ति होने के बाद इन मानदेयों को उसी रूप में जारी रखना अलग विषय है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्रशासक पंचायत का काम संभाल रहे हैं तो उन्हें मानदेय क्यों नहीं दिया जा रहा? इसका सीधा जवाब यह है कि किसी जिम्मेदारी को संभालना और उस जिम्मेदारी के बदले मानदेय मिलना दो अलग बातें हैं। मानदेय तभी दिया जा सकता है, जब उसके लिए शासनादेश या नियमों में स्पष्ट प्रावधान हो। यदि सरकार भविष्य में पंचायत प्रशासकों के लिए अलग से मानदेय या पारिश्रमिक तय करती है, तो इसके लिए अलग आदेश जारी किया जा सकता है। लेकिन सिर्फ पंचायत का प्रशासन संभालने के आधार पर उन्हें ग्राम प्रधान का पांच हजार रुपये प्रतिमाह वाला मानदेय देना नियमसम्मत नहीं माना जा सकता। इस मामले में पहले की व्यवस्था का उदाहरण भी दिया जा रहा है। जब पूर्व में एडीओ पंचायत को प्रशासक की जिम्मेदारी दी गई थी, तब उन्हें ग्राम प्रधान के बराबर मानदेय नहीं मिलता था। इसी आधार पर मौजूदा व्यवस्था में भी प्रशासकों को प्रधान का मानदेय नहीं देने की बात कही जा रही है।

हालांकि, अंतिम स्थिति संबंधित शासनादेश और लागू नियमों से ही स्पष्ट होगी। इसलिए जरूरी है कि पंचायती राज विभाग या सरकार की ओर से स्पष्ट लिखित आदेश जारी किया जाए। इससे ग्राम पंचायतों में प्रशासकों की जिम्मेदारी, अधिकार और भुगतान को लेकर किसी तरह का भ्रम नहीं रहेगा। प्रदेश में 58,213 ग्राम पंचायतें, 827 क्षेत्र पंचायतें और 75 जिला पंचायतें हैं। ऐसे में यह मुद्दा काफी महत्वपूर्ण है। पंचायतों का कामकाज जारी रहना जरूरी है, लेकिन इसके साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि प्रशासकों को किस नियम के तहत अधिकार दिए गए हैं और उनके लिए पारिश्रमिक की क्या व्यवस्था है। फिलहाल इतना साफ है कि ग्राम पंचायत प्रशासक और निर्वाचित ग्राम प्रधान एक ही पद नहीं हैं। प्रधान का पद चुनाव से मिलता है, जबकि प्रशासक प्रशासनिक व्यवस्था के तहत जिम्मेदारी संभालता है। इसलिए प्रधान का मानदेय प्रशासकों को स्वतः नहीं मिल सकता। अब सबकी नजर सरकार के अगले स्पष्ट आदेश और पंचायत चुनाव की प्रक्रिया पर है।

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