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विश्व सोरायसिस दिवस: एम्स में आयोजित कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने दी जानकारी

एम्स में विश्व सोरायसिस दिवस पर एक शैक्षणिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। चिकित्सा विशेषज्ञों ने बताया कि यह समस्या केवल त्वचा तक सीमित नहीं रहती है। समय पर बीमारी की पहचान करना और समन्वय के साथ इलाज करना आवश्यक है।

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Ankit Yadav
30 अक्ट 2026, 12:33
विश्व सोरायसिस दिवस: एम्स में आयोजित कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने दी जानकारी

एम्स में शैक्षणिक कार्यक्रम का आयोजन

गोरखपुर में स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के त्वचा रोग विभाग की तरफ से विश्व सोरायसिस दिवस के मौके पर एक विशेष शैक्षणिक सत्र का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ संस्थान के चिकित्सा अधीक्षक डॉ। अजय भारती ने अपने संबोधन के साथ किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में इस बात पर विशेष जोर दिया कि इस बीमारी की पहचान समय रहते कर ली जानी चाहिए ताकि रोगियों को सही समय पर चिकित्सीय लाभ मिल सके। इसके साथ ही उन्होंने विभिन्न चिकित्सा विधाओं के विशेषज्ञों के बीच बेहतर आपसी तालमेल और समन्वय के साथ मरीजों का उपचार करने की सख्त आवश्यकता बताई। इस पूरे आयोजन का मुख्य उद्देश्य इस गंभीर स्वास्थ्य समस्या के विभिन्न पहलुओं के बारे में लोगों और चिकित्सा जगत के बीच जागरूकता फैलाना था। कार्यक्रम के दौरान चिकित्सा जगत से जुड़े कई गणमान्य चिकित्सक और अधिकारी उपस्थित रहे जिन्होंने अपने विचार साझा किए। त्वचा रोग विभाग के द्वारा आयोजित इस सत्र में सोरायसिस की जटिलताओं और इसके संपूर्ण प्रबंधन पर विस्तार से चर्चा की गई ताकि आने वाले समय में पीड़ित रोगियों को और बेहतर चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकें और उनके स्वास्थ्य में सुधार लाया जा सके।

विभिन्न विभागों के विशेषज्ञों के विचार

कार्यक्रम के शैक्षणिक सत्र को आगे बढ़ाते हुए त्वचा रोग विभाग के प्रमुख प्रोफेसर सुनील कुमार गुप्ता ने अपनी बात रखी और समझाया कि यह प्रतिरक्षा प्रणाली की गड़बड़ी से उत्पन्न होने वाली लंबे समय तक शरीर में बनी रहने वाली सूजन से जुड़ी समस्या है। उन्होंने रेखांकित किया कि इसके उपचार के दौरान रोगी के केवल एक अंग पर नहीं बल्कि उसके संपूर्ण स्वास्थ्य पर पूरा ध्यान दिया जाना बहुत जरूरी है। इसके बाद सत्र के दौरान डॉ। सुशांतिका ने इस बीमारी से जुड़े हुए सभी महत्वपूर्ण पहलुओं के बारे में उपस्थित लोगों को विस्तार से जानकारी दी। एंडोक्राइनोलॉजी विभाग से जुड़े डॉ। देबादित्य दास ने इस बात पर प्रकाश डाला कि इस बीमारी का सीधा संबंध मेटाबॉलिक सिंड्रोम से भी होता है। सामान्य चिकित्सा विभाग के प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित डॉ। बृजेश कुमार चौधरी ने उस स्थिति पर विशेष चर्चा की जिसमें यह समस्या जोड़ों को प्रभावित करती है जिसे सोरायटिक आर्थराइटिस कहा जाता है। मनोचिकित्सा विभाग के प्रमुख डॉ। मनोज पृथ्वीराज एम। ने मानसिक स्वास्थ्य और रोगी के जीवन की गुणवत्ता पर इसके पड़ने वाले बुरे प्रभावों को समझाया। इसके अलावा फार्माकोलॉजी विभाग की तरफ से डॉ। विजयलक्ष्मी ने आधुनिक बायोलॉजिक दवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में सभी को अवगत कराया और अंत में त्वचा रोग विभाग की डॉक्टर शिवांगी राणा ने कार्यक्रम में मौजूद सभी लोगों का आभार व्यक्त किया।

त्वचा के साथ अन्य अंगों पर प्रभाव

चिकित्सा विशेषज्ञों ने इस संगोष्ठी के दौरान इस बात को बहुत स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि सोरायसिस को केवल एक साधारण त्वचा संबंधी विकार मानकर अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। यह बीमारी मानव शरीर की बाहरी त्वचा से बहुत आगे बढ़कर शरीर के अंदरूनी अन्य महत्वपूर्ण अंगों और साथ ही मानसिक स्वास्थ्य को भी गंभीर रूप से प्रभावित करने की पूरी क्षमता रखती है। इस स्वास्थ्य समस्या से ग्रस्त होने वाले लोगों के शरीर में कई अन्य गंभीर परेशानियां भी घर कर सकती हैं जिनमें मुख्य रूप से मधुमेह की समस्या, हृदय से जुड़ी तमाम समस्याएं, हड्डियों और जोड़ों में लगातार रहने वाला दर्द तथा अत्यधिक मानसिक तनाव शामिल हैं। जब स्थिति ऐसी होती है तो केवल ऊपरी त्वचा पर दिखने वाले लक्षणों का इलाज करना किसी भी स्थिति में पर्याप्त नहीं माना जा सकता है। इसलिए चिकित्सीय दृष्टिकोण से यह बेहद अनिवार्य हो जाता है कि रोगी के संपूर्ण शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर ही उपचार की कोई भी रूपरेखा तैयार की जाए। विशेषज्ञों के द्वारा दी गई इस बहुमूल्य जानकारी से यह स्पष्ट हो गया है कि इस बीमारी के संपूर्ण और प्रभावी इलाज के लिए एक से अधिक चिकित्सा विभागों के विशेषज्ञों का आपसी सहयोग होना कितना आवश्यक है ताकि मरीजों को इस जटिल बीमारी से पूरी तरह राहत मिल सके।

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