भारतीय चिकित्सा अनुसंधान के इतिहास में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के वैज्ञानिकों और डॉक्टरों की एक विशेष टीम ने दुर्लभ आनुवंशिक विकारों के उपचार के लिए एक स्वदेशी थेरेपी तैयार की है। पिछले कई वर्षों से एम्स की प्रयोगशालाओं में चल रहे इस गहन शोध के परिणाम अब सकारात्मक रूप में सामने आए हैं, जो भारत में चिकित्सा के क्षेत्र में एक बड़े बदलाव का संकेत दे रहे हैं। इस नई थेरेपी का मुख्य उद्देश्य उन बच्चों और वयस्कों की मदद करना है जो जन्मजात और अत्यधिक जटिल अनुवांशिक बीमारियों से पीड़ित होते हैं, और जिनका पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में कोई संतोषजनक इलाज उपलब्ध नहीं था। इस शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने अत्याधुनिक जीन-एडिटिंग तकनीकों का उपयोग किया है ताकि सटीक रूप से प्रभावित कोशिकाओं को लक्षित किया जा सके।
क्लिनिकल ट्रायल और मरीजों पर इसके चमत्कारी प्रभाव इस नई चिकित्सा पद्धति के शुरुआती क्लिनिकल ट्रायल्स के नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे हैं, जिन्हें हाल ही में एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल में भी प्रकाशित किया गया है। एम्स के डॉक्टरों की देखरेख में कुछ गंभीर रूप से पीड़ित मरीजों पर इस थेरेपी का सुरक्षित परीक्षण किया गया, जिसके दौरान किसी भी प्रकार के गंभीर दुष्प्रभाव देखने को नहीं मिले। मरीजों के स्वास्थ्य में तेजी से सुधार दर्ज किया गया और उनकी जीवन प्रत्याशा तथा गुणवत्ता में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। इस सफलता के बाद देश भर के चिकित्सा जगत में खुशी की लहर दौड़ गई है और दुनिया भर के शोध संस्थान एम्स के इस मॉडल का अध्ययन करने में रुचि दिखा रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी इस अभूतपूर्व उपलब्धि के लिए पूरी अनुसंधान टीम को बधाई दी है और इसे राष्ट्रीय गौरव का विषय बताया है।
भविष्य की योजनाएं और आम जनता के लिए उपलब्धता एम्स के निदेशक ने एक विशेष प्रेस वार्ता में घोषणा की है कि इस थेरेपी को जल्द ही बड़े पैमाने पर आम मरीजों के लिए किफायती दरों पर उपलब्ध कराने के प्रयास शुरू किए जाएंगे। इसके लिए सरकार के साथ मिलकर एक विशेष अनुदान कोष बनाया जा रहा है ताकि महंगे होने वाले इन आनुवंशिक इलाजों का बोझ गरीब मरीजों को न उठाना पड़े। आने वाले महीनों में देश के अन्य प्रमुख चिकित्सा संस्थानों के डॉक्टरों को भी इस नई तकनीक का विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा ताकि वे अपने क्षेत्रों के मरीजों का इलाज कर सकें। यह पहल भारत को मेडिकल टूरिज्म के साथ-साथ उच्च स्तरीय चिकित्सा अनुसंधान और दुर्लभ रोगों के इलाज के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने में मील का पत्थर साबित होगी।