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खाद्य सुरक्षा पर कड़ी फटकार: क्या भारत हमेशा अविकसित देश बना रहेगा? सुप्रीम कोर्ट का केंद्र से फ्रंट-ऑफ-पैकेज लेबलिंग पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने खाद्य पदार्थों पर फ्रंट-ऑफ-पैकेज लेबलिंग में हो रही देरी को लेकर केंद्र सरकार से तीखे सवाल पूछे हैं और देश के नागरिकों के स्वास्थ्य को सर्वोपरि रखने की बात कही है।

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Kantap News डेस्क
17 अग 2026, 11:57
खाद्य सुरक्षा पर कड़ी फटकार: क्या भारत हमेशा अविकसित देश बना रहेगा? सुप्रीम कोर्ट का केंद्र से फ्रंट-ऑफ-पैकेज लेबलिंग पर सवाल
आम नागरिकों के स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा के मामलों पर एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय ने अत्यंत सख्त रुख अख्तियार किया है। पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर स्पष्ट और चेतावनी भरे 'फ्रंट-ऑफ-पैकेज' (FOPL) लेबलिंग नियमों को लागू करने में हो रही सुस्ती पर नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सीधा सवाल किया कि क्या भारत को हमेशा एक अविकसित देश की तरह ही रहना है जहाँ जनता के स्वास्थ्य से जुड़े नियमों को लागू करने में इतनी लंबी देरी की जाए? अदालत ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि वैश्विक मानकों के अनुरूप उपभोक्ताओं को यह जानने का पूरा अधिकार है कि वे जो खाद्य वस्तुएं खरीद रहे हैं, उनमें चीनी, नमक और वसा की मात्रा कितनी हानिकारक सीमा तक मौजूद है।

जनस्वास्थ्य और उपभोक्ता अधिकार

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्तियों ने इस बात पर जोर दिया कि जंक फूड और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के बढ़ते सेवन से देश में लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां जैसे मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग खतरनाक रूप से बढ़ रहे हैं। यदि समय रहते उत्पादों के आगे स्पष्ट चेतावनी वाले लेबल नहीं लगाए गए, तो आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा। अदालत ने सरकार और संबंधित नियामक संस्थाओं को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे बिना किसी और देरी के पारदर्शी और कड़े दिशा-निर्देश लागू करें, ताकि कंपनियां उपभोक्ताओं को अंधेरे में न रख सकें और लोग सोच-समझकर स्वस्थ विकल्पों का चयन कर सकें।

उद्योग जगत और नीतिगत बदलाव

अदालत की इस सख्त टिप्पणी के बाद खाद्य और पेय पदार्थ बनाने वाली कंपनियों के बीच हलचल मच गई है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस न्यायिक हस्तक्षेप से नीतिगत फैसलों में तेजी आएगी और विनिर्माता कंपनियों को अपने उत्पादों की रेसिपी में सुधार करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। जनस्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने न्यायालय के इस कदम की भूरी-भूरी प्रशंसा की है और इसे देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक और आवश्यक कदम करार दिया है।
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