ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स), नई दिल्ली ने आज एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए कैंसर के मरीजों पर 'इम्यूनो-जेनेटिक थेरेपी' (IG-T) का क्लिनिकल ट्रायल शुरू कर दिया है। यह थेरेपी मुख्य रूप से उन मरीजों के लिए विकसित की गई है जो कीमोथेरेपी के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर चुके हैं। इस पद्धति में रोगी की अपनी कोशिकाओं को जेनेटिक रूप से संशोधित करके कैंसर कोशिकाओं पर हमला करने के लिए प्रेरित किया जाता है। प्रारंभिक लैब परीक्षणों में, इस थेरेपी ने ट्यूमर के आकार को 40 प्रतिशत तक कम करने में सफलता दिखाई है, जो चिकित्सा विज्ञान में एक बड़ी उपलब्धि है।
थेरेपी की कार्यप्रणाली और प्रभाव डॉक्टरों की एक टीम ने इस शोध को पूरा करने में पिछले पांच साल बिताए हैं। यह थेरेपी न केवल प्रभावी है, बल्कि कीमोथेरेपी की तुलना में इसके दुष्प्रभाव भी काफी कम हैं। मरीजों को अब अस्पताल में बार-बार भर्ती होने की जरूरत कम पड़ेगी, जिससे उनकी जीवन गुणवत्ता में सुधार होगा। हालांकि, अभी यह ट्रायल शुरुआती चरणों में है और इसके व्यापक परिणाम आने में कम से कम 18 महीने लगेंगे। एम्स के निदेशक ने कहा कि यदि यह परीक्षण सफल रहता है, तो भारत कैंसर उपचार के क्षेत्र में एक वैश्विक केंद्र बन सकता है।
सस्ती चिकित्सा की दिशा में कदम इस थेरेपी की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लागत है, जो विदेशों में उपलब्ध समान उपचारों की तुलना में काफी कम होगी। सरकार ने इस परियोजना को 'मेक इन इंडिया' स्वास्थ्य पहल के तहत विशेष अनुदान दिया है। कई स्वयंसेवी संस्थाएं भी मरीजों के इलाज के खर्च में मदद के लिए आगे आई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह न केवल मरीजों के लिए जीवनदान साबित होगा, बल्कि चिकित्सा अनुसंधान के क्षेत्र में भारत की साख को भी बढ़ाएगा। आने वाले हफ्तों में और भी अस्पतालों को इस ट्रायल का हिस्सा बनाया जाएगा ताकि डेटा की विविधता बढ़ सके और सटीक परिणाम मिल सकें।