वाराणसी में दोनों सीटों पर बड़ी हार
वाराणसी निर्वाचन क्षेत्र के दायरे में आने वाले आठ जिलों में सत्ताधारी दल और सहयोगी दलों के पास एक केंद्रीय मंत्री समेत कुल 11 मंत्री और 33 विधायक मौजूद हैं। इसके बावजूद विरोधी दल के उम्मीदवारों ने बड़े अंतर से जीत हासिल की है। खुद को सबसे बड़ा संगठन बताने वाले दल के शिक्षक और स्नातक दोनों ही उम्मीदवार लगातार दो बार चुनाव हार चुके हैं। इस बार की हार पहले की तुलना में और अधिक बड़ी रही है जिससे पार्टी संगठन के नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस असफलता के पीछे केवल एक ही नहीं बल्कि कई कारण छिपे हुए थे जिन पर समय रहते ध्यान देने की बेहद आवश्यकता थी। चुनाव परिणामों से यह साफ हो गया है कि जनप्रतिनिधियों और भारी भरकम पदाधिकारियों की फौज होने के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई ठोस काम नहीं किया गया। परिणाम आने के बाद अब नेता केवल कारणों की समीक्षा करने की बात कर रहे हैं लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान भी ऐसा ही हुआ था जब जवाबदेही तय नहीं की गई थी और आज वही स्थिति फिर से सामने आ गई है।
प्रत्याशी चयन में देरी और प्रचार में कमी
इस बड़ी असफलता के पीछे सबसे मुख्य कारण उम्मीदवारों के नामों की घोषणा करने में अत्यधिक देरी होना माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा आम है कि पार्टी नेतृत्व अंतिम समय तक सस्पेंस बनाए रखता है जो इस विधान परिषद चुनाव में भी पूरी तरह से देखने को मिला। शीर्ष नेतृत्व ने सभी जिलों से सूचियां मंगाई थीं और जनप्रतिनिधियों से फीडबैक भी लिया गया था लेकिन चयन प्रक्रिया में लंबा वक्त लग गया। इससे महीनों से सक्रिय रूप से मेहनत कर रहे दावेदार नाराज हो गए जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा। नाम घोषित होने का इंतजार करने के कारण किसी भी दावेदार ने निर्वाचन आयोग द्वारा एक वर्ष पूर्व शुरू किए गए वोटर लिस्ट पुनरीक्षण कार्य में हिस्सा नहीं लिया। जब तक उम्मीदवारों के नाम सामने आए तब तक बहुत देर हो चुकी थी जबकि विरोधी दलों के नेता इस दिशा में काफी पहले से सक्रिय हो चुके थे। वरुणापार के पांडेयपुर क्षेत्र के एक शिक्षक मतदाता ने खुलकर बताया कि कई बड़े नेताओं से पहचान होने के बावजूद किसी ने भी उन्हें पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करने के लिए एक बार भी नहीं कहा। इसके अलावा अवैध मतों की संख्या सबसे अधिक सत्ताधारी दल के उम्मीदवारों के पक्ष में ही पाई गई जिससे यह स्पष्ट होता है कि मतदाताओं को वोट डालने की सही प्रक्रिया तक नहीं समझाई गई थी।
दौरों और बैठकों का जमीन पर बेअसर होना
चुनाव जीतने के लिए पार्टी स्तर पर लगातार कई बैठकें आयोजित की गईं और शीर्ष नेताओं ने कार्यकर्ताओं को जमीन पर उतरकर काम करने का स्पष्ट निर्देश दिया था। इसके बावजूद केवल कागजी बैठकों तक ही समर्थन जुटाने की पहल सिमट कर रह गई और जमीन पर कोई भी असर नहीं दिखाई दिया। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने विशेष रूप से वाराणसी में दो दिनों तक प्रवास किया था और सभी जनप्रतिनिधियों, पूर्व जनप्रतिनिधियों, पदाधिकारियों तथा पुराने कार्यकर्ताओं से अलग-अलग संवाद किया था। उन्होंने अपनी बैठकों में साफ शब्दों में कहा था कि विधान परिषद चुनाव में मिलने वाली जीत ही आगे आने वाले विधानसभा चुनाव की सीढ़ी बनेगी। उन्होंने सभी मतदाताओं तक व्यक्तिगत रूप से पहुंचने का आदेश दिया था लेकिन चुनावी नतीजे ने यह साबित कर दिया कि उनकी एक भी बात पर गंभीरता से अमल नहीं किया गया। मुख्यमंत्री की दो जनसभाएं भी आयोजित की गईं जिनका कोई लाभ उम्मीदवारों को नहीं मिल सका। इसके अलावा शिक्षक पद के लिए डॉ। प्रमोद कुमार मिश्र का नाम तय होते ही पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच गहरा असंतोष फैल गया था। कार्यकर्ता दबी जुबान से यह बात कहने लगे थे कि जो व्यक्ति हमेशा पार्टी के खिलाफ संघर्ष करता रहा, उसे ही अचानक नामांकन से कुछ दिन पहले उम्मीदवार बना दिया गया।