चुनावी मैदान में सत्ताधारी दल की पूरी ताकत
उत्तर प्रदेश के विधान परिषद चुनावों की प्रक्रिया के दौरान राजनीतिक सरगर्मी काफी बढ़ गई है। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। पार्टी के रणनीतिकार और नेता हर एक सीट पर अपनी मजबूत पकड़ बनाने के लिए लगातार सक्रिय हैं। राज्य के विभिन्न हिस्सों में चुनावी तैयारियों को अंतिम रूप देने के लिए बैठकों का दौर भी जारी है। सत्ताधारी दल द्वारा हर संभव संसाधन का उपयोग किया जा रहा है ताकि इस महत्वपूर्ण विधायी चुनाव में किसी भी प्रकार की कमी न रह जाए। दूसरी ओर विपक्षी राजनीतिक दलों की रणनीतियां इस बार काफी अलग और सीमित नजर आ रही हैं। विपक्षी दलों की तरफ से कोई बड़ा साझा अभियान या आक्रामक रणनीति देखने को नहीं मिल रही है। राजनीतिक विश्लेषक इसे सत्ताधारी दल की आक्रामक रणनीति और विपक्ष की सुस्ती के रूप में देख रहे हैं।
विपक्ष की भूमिका सिर्फ प्रत्याशियों के भरोसे
विधान परिषद के इस चुनावी संग्राम में विपक्षी दलों का रवैया पूरी तरह से अलग और रक्षात्मक दिखाई दे रहा है। विपक्षी खेमे की तरफ से कोई व्यापक जमीनी तैयारी या बड़ा प्रचार अभियान धरातल पर उतरता हुआ नहीं दिख रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि विपक्ष ने अपनी पूरी चुनावी वैतरणी केवल अपने अधिकृत प्रत्याशियों के कंधों पर ही छोड़ दी है। प्रत्याशी अपने स्तर पर चुनाव प्रचार और जनसंपर्क करने के लिए मजबूर नजर आ रहे हैं। पार्टी संगठनों का वह केंद्रीय समर्थन और संसाधन विपक्ष के उम्मीदवारों के साथ दिखाई नहीं दे रहा है जो इस तरह के बड़े चुनावों में जरूरी होता है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि क्या विपक्षी दल बिना किसी ठोस रणनीति के ही इस मैदान में उतर गए हैं। जनता और मतदाताओं के बीच भी विपक्ष की इस निष्क्रियता को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं। स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ता भी अपने वरिष्ठ नेताओं से बड़े दिशा-निर्देशों का इंतजार कर रहे हैं।
चुनाव की पृष्ठभूमि और इसका महत्व
भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में विधान परिषद यानी उच्च सदन का चुनाव हमेशा से बेहद खास और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। इस सदन के जरिए राज्य की नीतियों और कानूनों पर नियंत्रण रखने के साथ-साथ विधायी कार्यों में संतुलन बनाया जाता है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में विधान परिषद की सीटों का राजनीतिक समीकरण दोनों ही पक्षों के लिए दूरगामी परिणाम देने वाला होता है। इस चुनाव की प्रक्रिया लोकसभा और विधानसभा चुनावों से काफी अलग होती है क्योंकि इसमें आम मतदाता सीधे वोट नहीं डालते हैं। इसके बजाय विभिन्न कोटे और निर्वाचन क्षेत्रों के जरिए चुने गए प्रतिनिधि ही अपने मतों का प्रयोग करते हैं। यही कारण है कि इस चुनाव में हर एक वोट का गणित बहुत ही ज्यादा संवेदनशील और राजनीतिक दलों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन जाता है। राजनीतिक दलों के लिए यह चुनाव अपनी ताकत दिखाने का एक बड़ा जरिया बन चुका है।