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राजनीति

राजनीतिक विवाद: कांग्रेस द्वारा पूरा वंदे मातरम् न गाने के फैसले पर 'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' में महाबहस

भारतीय राजनीति में एक बार फिर राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' को लेकर गहमागहमी तेज हो गई है। हाल ही में कांग्रेस पार्टी के रुख और उसके कारणों पर आधारित एक तीखी चर्चा 'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' कार्यक्रम में देखने को मिली।

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Ankit Yadav
21 अग 2026, 14:29
राजनीतिक विवाद: कांग्रेस द्वारा पूरा वंदे मातरम् न गाने के फैसले पर 'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' में महाबहस
भारतीय राजनीति के गलियारों में राष्ट्रीय प्रतीकों और गीतों को लेकर छिड़ी बहस थमने का नाम नहीं ले रही है। हाल ही में सामने आए घटनाक्रम के अनुसार, कांग्रेस पार्टी द्वारा पूरा 'वंदे मातरम्' न गाए जाने के निर्णय ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है और विभिन्न मंचों पर इस विषय पर लगातार प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। इसी कड़ी में प्रमुख मीडिया प्लेटफॉर्म 'इंडिया टीवी हिंदी' के लोकप्रिय कार्यक्रम 'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' में इस संवेदनशील विषय पर एक विस्तृत और गहरी चर्चा आयोजित की गई, जिसमें कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर खुलकर बात रखी गई।

वंदे मातरम् पर सियासी घमासान और उसके मायने

कार्यक्रम के दौरान राजनीतिक विश्लेषकों और विभिन्न दलों के प्रवक्ताओं ने इस बात पर मंथन किया कि आखिर इस प्रकार के ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व के गीतों को लेकर अलग-अलग राजनीतिक रुख क्यों अपनाए जाते हैं। चर्चा में मुख्य रूप से यह सवाल उठाया गया कि कांग्रेस पार्टी ने अपने इस फैसले के पीछे क्या तर्क दिए हैं और इसका देश के राजनीतिक परिदृश्य पर किस तरह का प्रभाव पड़ सकता है। जानकारों का मानना है कि ऐसे मुद्दे अक्सर चुनावी माहौल में वैचारिक सरगर्मी को और अधिक बढ़ा देते हैं, जिससे आम जनता के बीच भी बहस छिड़ जाती है। कार्यक्रम में वक्ताओं ने इतिहास के पन्नों को खंगालते हुए यह भी रेखांकित किया कि कैसे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इन गीतों ने देशवासियों को एकजुट करने का काम किया था और आज के दौर में इनकी प्रासंगिकता को किस रूप में देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में इस तरह के मुद्दों के तूल पकड़ने की पूरी संभावना है क्योंकि विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने वैचारिक नजरिए के आधार पर जनता के बीच जा रहे हैं। जहां एक ओर इसे लेकर तीखी आलोचनाएं हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर बचाव पक्ष के अपने तर्क भी सामने आ रहे हैं। 'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' जैसे मंचों पर होने वाली इन बहसों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वैचारिक मतभेद भारतीय लोकतंत्र का एक अहम हिस्सा हैं, जो समय-समय पर सतह पर आते रहते हैं। जनता और राजनीतिक दलों के बीच इस विषय पर आगे भी बयानबाजी जारी रहने की उम्मीद है, जिससे यह मामला शांत होने के बजाय और अधिक तूल पकड़ सकता है।
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