इंदौर में दूषित पेयजल त्रासदी और न्यायिक आयोग की रिपोर्ट
मध्य प्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने शुक्रवार को इंदौर में एक महत्वपूर्ण प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित किया। उन्होंने इस दौरान भागीरथपुरा क्षेत्र में हुई दूषित पेयजल त्रासदी और हाल ही में सामने आई न्यायिक जांच रिपोर्ट का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि यह खौफनाक घटना स्वच्छता के मामले में पूरे देश में अपनी एक खास पहचान रखने वाले इंदौर शहर की व्यवस्थाओं पर गंभीर सवालिया निशान लगाती है। नागरिकों के जीवन की रक्षा, सुरक्षित पेयजल की आपूर्ति, प्रशासनिक जवाबदेही और संपूर्ण नगर व्यवस्था को लेकर इस घटना ने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के द्वारा एक विशेष न्यायिक जांच आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग को पेयजल प्रदूषण के असली कारणों, बीमारी तथा मौतों के आंकड़ों, प्रशासनिक और तकनीकी खामियों तथा इसके लिए जिम्मेदार लोगों की गहराई से जांच करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। सिंघार ने संवाददाताओं से बातचीत करते हुए कहा कि इस आयोग की विस्तृत रिपोर्ट से कई चौंकाने वाले और गंभीर तथ्य उजागर हुए हैं। रिपोर्ट में साफ तौर पर सामने आया है कि किस प्रकार पेयजल के दूषित होने में प्रशासनिक देरी हुई और महत्वपूर्ण तकनीकी अभिलेख समय पर उपलब्ध नहीं कराए गए। देश के सबसे स्वच्छ शहर के रूप में विख्यात स्थान पर दूषित पानी पीने से आखिर लोगों की मौतें कैसे हो गईं। इस पूरी घटना ने यह साबित कर दिया है कि आम नागरिकों को नगर निगम द्वारा मुहैया कराया जा रहा पेयजल बिल्कुल भी सही और सुरक्षित नहीं था।
आयोग की जांच रिपोर्ट में सामने आए गंभीर तकनीकी तथ्य
न्यायिक जांच आयोग ने अपनी यह महत्वपूर्ण रिपोर्ट अगस्त 2026 में आधिकारिक रूप से प्रस्तुत की थी। इसके बाद माननीय उच्च न्यायालय ने इस रिपोर्ट को अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से अपलोड करने के स्पष्ट निर्देश जारी किए थे। आयोग की जांच रिपोर्ट के अनुसार भागीरथपुरा इलाके में स्थानीय नागरिकों को प्रदाय किया जाने वाला पेयजल पूरी तरह से दूषित था और मानव उपभोग के लिए बिल्कुल अनुपयुक्त पाया गया था। विस्तृत जांच के दौरान मुख्य रूप से सीवेज के गंदे पानी का पेयजल पाइपलाइन के अंदर प्रवेश कर जाना ही इस प्रदूषण का सबसे बड़ा और प्रमुख कारण बताया गया है। इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में अपनी संस्तुति के तहत कुल 36 में से 22 मौतों को दूषित पानी पीने के कारण हुई मौतें माना है। इसके अलावा रिपोर्ट में जल वितरण और सीवरेज व्यवस्था की योजना बनाने, उसके रखरखाव, उसकी नियमित निगरानी तथा पर्यवेक्षण में भारी व्यवस्थागत कमियों की ओर भी स्पष्ट संकेत किया गया है। सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि इस पूरी व्यवस्था के नक्शे, ब्लूप्रिंट और इंजीनियरिंग से जुड़े जरूरी रिकॉर्ड मौके पर उपलब्ध नहीं थे। आयोग ने अपनी जांच के दौरान पाया कि उन्हें कई तकनीकी और इंजीनियरिंग दस्तावेज जांच दल को उपलब्ध ही नहीं कराए गए थे। इन सभी गायब दस्तावेजों में लेआउट प्लान, ब्लूप्रिंट, डिजाइन ड्रॉइंग, पाइपलाइन अलाइनमेंट मैप और अन्य कई महत्वपूर्ण तकनीकी रिकॉर्ड शामिल थे। नेता प्रतिपक्ष सिंघार ने इस बात पर कड़ा आरोप लगाया कि इतने महत्वपूर्ण सरकारी रिकॉर्ड आखिर आयोग को जानबूझकर क्यों नहीं मुहैया कराए गए। इन सभी सरकारी रिकॉर्डों के उचित संरक्षण और उनकी समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने में हुई भारी लापरवाही के लिए आखिर किसकी जवाबदेही तय की जाएगी।
मृतकों के परिवारों के लिए मुआवजे और सहायता की मांग
न्यायिक जांच आयोग ने अपनी आधिकारिक सिफारिशों में इस त्रासदी के सभी पीड़ितों के लिए राहत की बड़ी बात कही है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से सिफारिश की है कि इस घटना में जान गंवाने वाले मृतकों के परिवारों को आर्थिक मुआवजा दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही प्रभावित मरीजों के लिए भी पर्याप्त आर्थिक मदद और बेहतर चिकित्सकीय सहायता का स्पष्ट प्रावधान किया गया है। आयोग की सिफारिश के मुताबिक प्रत्येक मृतक के परिवार को दस लाख रुपये का मुआवजा दिया जाना चाहिए ताकि उनका संबल बन सके। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने राज्य सरकार से कड़े शब्दों में यह सवाल पूछा है कि सरकार यह तय करके बताए कि यह मुआवजा पीड़ितों को आखिरकार कब तक वितरित किया जाएगा। उन्होंने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही के कारण निर्दोष नागरिकों की जान गई है और सरकार को इस मामले में अब और अधिक देरी नहीं करनी चाहिए। प्रभावित परिवारों और इलाज करा रहे मरीजों की सहायता के लिए प्रशासन को तुरंत ठोस कदम उठाने की जरूरत है। इस पूरी घटना की पृष्ठभूमि यह बताती है कि नगर निगम और तकनीकी विभागों के बीच समन्वय की भारी कमी रही है जिसके कारण यह बड़ी मानवीय त्रासदी घटित हुई। आम जनता के स्वास्थ्य और जीवन से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर सरकार को पूरी पारदर्शिता के साथ जवाब देना चाहिए और सभी प्रभावितों को समय पर राहत पहुंचानी चाहिए। इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कड़े प्रशासनिक उपाय करना आज के समय की सबसे बड़ी और अहम जरूरत बन गया है।