विपक्षी दलों का मार्च और चुनाव आयोग पर घेराव की तैयारी
विपक्षी पार्टियों के गठबंधन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यालय का घेराव करने की अपनी योजना बनाई है। यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है कि वे अपनी मांगों के समर्थन में प्रदर्शन करें। इसी क्रम में दो से आठ अक्टूबर तक पूरे देश में उनके इस्तीफे की मांग के साथ मार्च निकाले जाने का कार्यक्रम तय किया गया है। यह अहम निर्णय विपक्षी गठबंधन की बैठक में तीस सितंबर को आयोजित चर्चा के दौरान लिया गया था। हालांकि इसके बावजूद यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि यह घोषित मार्च सभी दल मिलकर एक साथ निकालेंगे या फिर हर पार्टी अपने स्तर पर अलग-अलग प्रदर्शन करेगी। उदाहरण के लिए मुंबई में शिवसेना उबाठा ने एक मार्च की घोषणा करते हुए कांग्रेस और राकांपा शरद गुट को भी इसमें शामिल होने का आमंत्रण दिया है। दूसरी तरफ केरलम में वामपंथी दलों और कांग्रेस के बीच ऐसा संयुक्त प्रदर्शन होना मुश्किल नजर आ रहा है क्योंकि वहां कांग्रेस नेता रमेश चेनिथला का कहना है कि विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण ठीक से न होने पर वामपंथी बोगस वोटिंग करा देते। तमिलनाडु में भी डीएमके और टीवीके की एकजुटता पर सवाल बने हुए हैं क्योंकि डीएमके कांग्रेस से नाराज होकर विपक्षी दलों की बैठक में भी शामिल नहीं हुई थी। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद ममता बनर्जी की पार्टी और कांग्रेस के बीच भी तालमेल का अभाव दिखता है।
ईवीएम के विरोध में मांग और विपक्षी नेताओं की आपसी खींचतान
विपक्षी गठबंधन की मुख्य मांगों में यह भी शामिल है कि आगामी चुनाव इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के बजाय बैलेट पेपर के माध्यम से कराए जाएं। हालांकि इस मांग के समर्थन में विपक्ष के पास कोई भी ठोस सैद्धांतिक, तकनीकी या तार्किक आधार मौजूद नहीं है। साथ ही विपक्षी खेमे में नेतृत्व और आपसी रणनीतिक तालमेल को लेकर भी बड़ी खींचतान चल रही है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने न तो ऑनलाइन और न ही ऑफलाइन माध्यम से इस बैठक में हिस्सा लिया क्योंकि वे आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियों और राज्यसभा के कार्यों में व्यस्त हैं। उनके पार्टी प्रवक्ताओं का यह मानना है कि वे इस समय आंदोलन की बजाय चुनाव की तैयारी पर पूरा ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। अखिलेश को यह भी डर सता रहा है कि इस आंदोलन में शामिल होने से उनका हाल बिहार के नेता जैसा न हो जाए। इसके अलावा कांग्रेस पार्टी और उसके रणनीतिकार उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए पूरी योजना बना रहे हैं। कांग्रेस नेताओं का यह भी मानना है कि वे जनता की वास्तविक समस्याओं और नाराजगी के मुद्दों को सही से भुनाने की बजाय केवल आभासी दुनिया के समर्थन पर निर्भर रहते हैं। सिविल सोसायटी के कुछ खास और निष्प्रभावी चेहरों पर भरोसा करना भी कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है क्योंकि इन लोगों का मुख्य उद्देश्य अपनी खुद की दुकान चलाना होता है।
ऐतिहासिक संदर्भ और राजनीतिक रणनीतियों की वास्तविकता
चुनाव प्रक्रिया और वोट चोरी को लेकर इतिहास में कई ऐसे उदाहरण दिए जाते हैं जिनका वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य से गहरा नाता है। ऐसा माना जाता है कि वोट चोरी और गड़बड़ियों की शुरुआत बहुत पहले हो गई थी जब डॉ भीमराव अंबेडकर को चुनाव में हराया गया था और उनके हजारों वोट अवैध घोषित कर दिए गए थे। इसके अलावा मौलाना आजाद के चुनाव परिणाम को लेकर भी तत्कालीन नेतृत्व द्वारा हस्तक्षेप किए जाने के किस्से चर्चित रहे हैं। इंदिरा गांधी ने भी सरकारी तंत्र के दुरुपयोग से चुनाव जीता था और अदालत के फैसले के बाद आपातकाल लागू कर दिया था। वर्तमान में राहुल गांधी यह सवाल उठाते हैं कि जब इंदिरा गांधी हार सकती हैं तो नरेंद्र मोदी क्यों नहीं हार सकते। इसके जवाब में विश्लेषक यह मानते हैं कि जनता जब किसी शासन से त्रस्त होती है तभी उसे सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाती है। भाजपा ने अतीत में कई राज्यों में चुनाव हारे भी हैं और समय पर अपनी रणनीतियों में आवश्यक सुधार भी किए हैं। विपक्षी गठबंधन को चाहिए कि वे जनता की वास्तविक नाराजगी के कारणों को पहचानें और उनके ठोस समाधान के साथ जनता के बीच जाएं। यदि वे केवल सतही विरोध और बिना किसी तकनीकी आधार के ईवीएम हटाने की मांग करते रहेंगे तो उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाएगी। विपक्षी खेमे की हालिया बैठक में ऐसा कोई भी दूरगामी और ठोस फैसला नहीं लिया गया जिससे यह प्रतीत हो सके कि वे एनडीए के मुकाबले के लिए किसी लंबी और मजबूत योजना पर काम कर रहे हैं।