मध्य प्रदेश की राजनीतिक भूमि इन दिनों देश के प्रमुख वैचारिक और राजनीतिक दिग्गजों के दौरों तथा शिविरों का मुख्य केंद्र बन गई है। केंद्रीय पटल के बड़े नेता, जिनमें कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत शामिल हैं, इस राज्य को अपनी रणनीतिक गतिविधियों का प्रमुख मंच बना रहे हैं। राज्य के विभिन्न हिस्सों में लगातार हो रहे इन कार्यक्रमों और वैचारिक बैठकों ने यह साबित कर दिया है कि आगामी राजनीतिक समीकरणों को साधने के लिए इस क्षेत्र को कितनी प्राथमिकता दी जा रही है। राजनीतिक दलों के रणनीतिकार इस बात को भली-भांति समझ चुके हैं कि मध्य प्रदेश की जमीन पर पकड़ बनाए बिना राष्ट्रीय स्तर पर अपनी वैचारिक और चुनावी पकड़ मजबूत करना कठिन हो सकता है, जिसके कारण दोनों पक्षों की ओर से यहां लगातार सियासी पाठशालाएं लगाई जा रही हैं।
इस राजनीतिक सरगर्मी के ऐतिहासिक और वैचारिक संदर्भों को देखें तो मध्य प्रदेश हमेशा से ही भारतीय राजनीति के मुख्य वैचारिक संघर्षों और प्रयोगों की प्रयोगशाला रहा है। एक तरफ जहां संघ परिवार अपनी वैचारिक जड़ों को और अधिक गहरा करने के लिए लगातार अनुशासनात्मक और वैचारिक सत्रों का आयोजन कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दल भी अपनी विचारधारा के विस्तार और जनता के बीच अपनी पकड़ वापस पाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। राज्य की भौगोलिक स्थिति और देश के मध्य में स्थित होने के कारण यह हिंदी पट्टी के अन्य राज्यों की दिशा तय करने में भी बड़ी भूमिका निभाता है। यही कारण है कि प्रमुख राजनीतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व का पूरा ध्यान इस भूभाग पर केंद्रित है, ताकि वे यहां के सामाजिक ताने-बाने और स्थानीय मुद्दों को नजदीक से समझ सकें और अपनी भविष्य की रणनीतियों को उसी अनुरूप ढाल सकें।
इन तमाम गतिविधियों और बैठकों के दूरगामी राजनीतिक परिणाम आने वाले समय में राज्य की चुनावी और सामाजिक दिशा तय करेंगे। जब देश के शीर्ष वैचारिक और राजनीतिक नेतृत्व सीधे तौर पर किसी राज्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं, तो इसका सीधा असर स्थानीय कार्यकर्ताओं के मनोबल और आम जनता की सोच पर पड़ता है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि इन विभिन्न वैचारिक पाठशालाओं और राजनीतिक दौरों का जनता के बीच कितना असर होता है और कौन सा दल अपनी रणनीतिक बढ़त बनाने में सफल रहता है। स्थानीय स्तर पर भी इन बैठकों के बाद राजनीतिक बयानबाजी और विरोध-प्रदर्शन का दौर तेज हो गया है, जिससे राज्य का राजनीतिक तापमान लगातार ऊँचा बना हुआ है और हर कोई आगामी राजनीतिक बदलावों के संकेतों को समझने की कोशिश कर रहा है।