विपक्षी दलों पर लगातार बढ़ते हमले और पुलिस की निष्क्रियता
पश्चिम बंगाल में राजनीतिक सत्ता बदलने के बाद से विपक्षी दलों के खिलाफ कार्रवाई का नया दौर शुरू हो चुका है। तृणमूल कांग्रेस और अन्य विरोधी दलों के कार्यालयों में तोड़फोड़ की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। विपक्षी उम्मीदवारों को गिरफ्तार किया जा रहा है और छात्रों को भी डराया जा रहा है। तीन बार मुख्यमंत्री रह चुकीं ममता बनर्जी को सार्वजनिक कार्यक्रमों के आयोजन से बार-बार रोका जा रहा है। आनंद बाजार पत्रिका के दफ्तर की दीवारों को भगवा रंग से रंगा गया और अभिषेक बनर्जी के कैमैक स्ट्रीट कार्यालय पर भी हमला हुआ। जब राजनीतिक दफ्तरों को निशाना बनाया जाता है या विपक्षी नेताओं पर अंडे फेंके जाते हैं, तब पुलिस अधिकारियों की भूमिका सवालों के घेरे में रहती है। खाकी वर्दीधारी या तो मौके पर लाचार दिखते हैं या फिर घटना में कोई राजनीतिक मकसद नहीं ढूंढ पाते हैं। हालांकि किसी पुराने वारंट के मामले में विरोधी उम्मीदवारों के खिलाफ पुलिस मशीनरी बहुत तेजी से सक्रिय हो जाती है। नंदीग्राम उपचुनाव में तृणमूल उम्मीदवार ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मिलने के बाद अपना नाम वापस ले लिया। ममता बनर्जी द्वारा कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान का समर्थन करने के तुरंत बाद उन्हें पुराने मामले में गिरफ्तार कर लिया गया।
गुजरात मॉडल की तर्ज पर बंगाल में शासन प्रणाली का बदलता स्वरूप
पश्चिम बंगाल में जो बदलाव हो रहा है उसे केवल साधारण राजनीतिक फेरबदल नहीं माना जा सकता है। यह राज्य को पार्टी की पसंद के मुताबिक एक नई राजनीतिक प्रयोगशाला में ढालने का खुला प्रयास है। इसमें आक्रामक हिंदुत्व, भारी सरकारी ताकत, विपक्ष को कमजोर करना और कॉरपोरेट हितों के साथ तालमेल शामिल है। शाकाहारी भोजन को बढ़ावा देने के संकेत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में भारी बढ़ोतरी भी इस बदलाव का हिस्सा हैं। प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था का इस्तेमाल करके असहमति की आवाजों को दबाया जा रहा है। गुजरात में जिस तरह धारा 144 और पुलिस कानूनों के जरिए शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर रोक लगाई जाती है, वैसी ही स्थितियां बंगाल में भी दिखती हैं। अहमदाबाद पुलिस द्वारा बार-बार लगाए जाने वाले प्रतिबंधात्मक आदेशों को गुजरात हाई कोर्ट तक को रद्द करना पड़ा था। साल 2019 के सीएए विरोधी प्रदर्शनों से लेकर 2025 तक ऐसे आदेशों का इस्तेमाल नागरिकों को इकट्ठा होने से रोकने के लिए किया गया। देवभूमि द्वारका कलेक्टरेट ने भी सरकारी दफ्तरों के पास धरना और जुलूस निकालने पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे। विरोध के हर अधिकार को संवैधानिक स्वतंत्रता के बजाय पुलिस की अनुमति पर निर्भर एक विशेषाधिकार बना दिया गया है। आलोचकों को हिरासत में लेने और मुकदमों में उलझाने का यह तरीका अब बंगाल की राजनीतिक जमीन पर भी स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है।
धार्मिक ध्रुवीकरण और अल्पसंख्यक समुदायों के सामने बढ़ती चुनौतियां
राज्य के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने के बजाय खुद को एक हिंदू नेता के रूप में स्थापित कर रहे हैं। उनकी सार्वजनिक छवि में धार्मिक आयोजनों, जुलूसों और साधु-संतों को अत्यधिक प्रमुखता दी जा रही है। बांग्लादेशियों, अजान और लाउडस्पीकर जैसे मुद्दों को लगातार हवा देकर यह माहौल बनाया जा रहा है कि बहुसंख्यक संस्कृति खतरे में है। रेहड़ी और पटरी पर सामान बेचने वाले छोटे दुकानदारों की आजीविका को तोड़फोड़ की कार्रवाइयों के जरिए निशाना बनाया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनावों को अल्पसंख्यक मतदाताओं के लिए एक बड़ी परीक्षा करार दिया है। उन्होंने नए असामाजिक गतिविधि रोकथाम कानून यानी गुंडा बिल को विशेष समुदाय के लोगों से जोड़कर बयान दिए हैं। बंगाल की पारंपरिक मिली-जुली और बहस वाली संस्कृति को एक समान हिंदुत्ववादी सोच के खांचे में ढालने का प्रयास किया जा रहा है। चुनाव औपचारिक रूप से भले ही जारी रहें लेकिन विरोधियों के लिए सार्वजनिक मंचों पर टिके रहना असंभव सा बना दिया गया है। पहले बंगाल में छोटी सी घटना पर भी राष्ट्रीय स्तर पर आपातकाल जैसे हालात की चर्चा होने लगती थी। आज जब विपक्ष पर सुनियोजित हमले हो रहे हैं और दफ्तर तोड़े जा रहे हैं, तब मुख्यधारा के चैनलों पर सन्नाटा पसरा हुआ है।