राजनीति में कदम और उठाए गए कड़े मुद्दे
पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल ने मंगलवार को अपनी नई राजनीतिक पारी का ऐलान करते हुए भविष्य की अपनी रूपरेखा सबके सामने रखी। उन्होंने साफ किया कि फिलहाल वह किसी भी राजनीतिक दल के साथ नहीं जुड़ रही हैं लेकिन उनके द्वारा उठाए गए विषयों पर विपक्षी दल लगातार सरकार को घेर रहे हैं। दिव्या ने मिर्जापुर के लहुरियादह गांव में स्कूल न होने का गंभीर मामला उठाया और बताया कि उनके कार्यकाल के दौरान डीएम रहते हुए स्कूल की मंजूरी मिल गई थी। इसके बावजूद आज तीन साल बीत जाने के बाद भी वहां निर्माण कार्य क्यों शुरू नहीं हो पाया। उन्होंने राजनेताओं के दबाव में आकर आम नागरिकों को अनावश्यक रूप से परेशान करने वाली प्रशासनिक कार्रवाइयों की तरफ भी इशारा किया। गांवों में सड़कों की दयनीय हालत, सड़कों के बड़े-बड़े गड्ढे और उनमें गिरकर लोगों के घायल होने तथा खून बहने जैसी दुर्घटनाओं का जिक्र किया। इसके अलावा उन्होंने परीक्षाओं के दौरान होने वाले पेपर लीक के मामलों पर भी गहरी चिंता व्यक्त की और कहा कि इन घटनाओं ने कड़ी मेहनत करके पढ़ाई करने वाले युवाओं के सपनों को पूरी तरह से तोड़ दिया है। उन्होंने कहा कि पहले के समय में यह कहा जाता था कि जो पढ़ेगा वही आगे बढ़ेगा क्योंकि हम सब लोग खुद पढ़ाई करके ही इस मुकाम तक पहुंचे हैं। लेकिन मौजूदा समय में लगातार हो रहे पेपर लीक ने हर उस विद्यार्थी को निराश कर दिया है जो अपनी रातें जागकर पढ़ाई में बिताता है।
अधूरे वादे और फाइलों में उलझे न्याय की दास्तान
दिव्या मित्तल ने मिर्जापुर में अपनी तैनाती के दौरान की एक पुरानी घटना को याद करते हुए बताया कि एक महिला ने उनसे शिक्षा के लिए गुहार लगाई थी। महिला ने उनसे किसी पेंशन या पक्के मकान की मांग नहीं की बल्कि उसने गांव में स्कूल की मांग करते हुए कहा कि उनके इलाके में पढ़ाई केवल पांचवीं कक्षा तक ही सीमित है। इसके बाद बच्चों की शिक्षा जंगल और पहाड़ों के बीच आकर अचानक समाप्त हो जाती है। उस महिला के घर में पीने का पानी तक मौजूद नहीं था लेकिन उसने सबसे पहले अपने गांव के बच्चों के भविष्य के लिए स्कूल मांगा। नियमों की जांच करने के बाद उन्होंने उस विद्यालय के निर्माण की स्वीकृति दे दी थी लेकिन आज तीन साल बाद भी वहां एक ईंट नहीं रखी गई। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या वहां स्वीकृति की कोई कमी थी या फिर प्रशासनिक स्तर पर केवल सही इरादे का अभाव था। यदि इरादा पक्का होता तो बड़ी से बड़ी पहाड़ियां भी रास्ता दे देती हैं लेकिन अगर इरादा न हो तो एक छोटी सी फाइल भी पहाड़ जैसी बड़ी रुकावट बन जाती है। राजस्व में विशेष सचिव पद पर अपने कार्यकाल को याद करते हुए उन्होंने एक और व्यक्ति का जिक्र किया जो प्लास्टिक की पन्नी में अपने कागजात लेकर उनके पास आया था। उस भूमिहीन व्यक्ति को एसडीएम के आदेश पर सरकारी जमीन का छोटा सा पट्टा तो मिला था लेकिन धरातल पर उसे कब्जा नहीं मिल पा रहा था। जब दस्तावेजों की जांच की गई तो रिपोर्ट झूठी पाई गई और संबंधित अधिकारियों पर उचित कार्रवाई भी की गई। लेकिन जब उस गरीब व्यक्ति को कब्जा दिलाने की बात आई तो ऊपर से सख्त मनाही के आदेश आ गए। संविधान देश के आम नागरिकों को सर्वोच्च मानता है तो फिर एक सामान्य व्यक्ति को न्याय हासिल करने के लिए हर तरफ इस तरह क्यों भटकना पड़ता है।
व्यवस्था पर सवाल और संसद से लेकर सदन तक चुप्पी
दिव्या मित्तल ने ग्रामीण क्षेत्रों की बुनियादी समस्याओं का जिक्र करते हुए कहा कि आज भी हजारों ऐसे गांव मौजूद हैं जहां पक्की सड़कें नहीं बनी हैं। अगर किसी गांव के पास से नदी गुजरती है तो वहां आवागमन के लिए पुल का निर्माण नहीं हुआ है और बरसात के दिनों में पूरा गांव एक टापू बन जाता है। पीढ़ियों से लोग इन बुनियादी सुविधाओं के लिए लगातार इंतजार करने को मजबूर हैं। जिन गांवों में सड़कें बनी भी हैं तो उनकी हालत इतनी खराब है कि उन पर बने गड्ढे जानलेवा साबित हो रहे हैं। स्कूल जाने वाले छोटे बच्चों के सफेद कपड़े इन गड्ढों की कीचड़ से सुरक्षित नहीं रह पाते और बाइक चालकों के दुर्घटनाग्रस्त होने पर उनके खून के छींटे भी इन सड़कों पर बिखर जाते हैं। प्रशासन और हुक्मरानों को इन सभी समस्याओं, गड्ढों की सटीक लोकेशन, फाइलों के नंबर और सड़क हादसों में होने वाली मौतों के आधिकारिक आंकड़े तक पूरी जानकारी होती है। कमी है तो केवल इस बात की कि अधिकारियों के मन में आम जनता के प्रति कोई फिक्र नहीं बची है। यदि सचमुच संवेदनशीलता होती तो हर मौत महज एक हादसा बनकर नहीं बल्कि कड़े फैसले की वजह बनती। एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाली लड़की के रूप में उन्होंने कहा कि इस देश ने शिक्षा के जरिए आगे बढ़ने का पक्का वादा किया था जिसे उन्होंने खुद पूरा किया। लेकिन आज के समय में हमारे देश के बच्चों की स्थिति यह हो चुकी है कि वे रात-रात भर जागकर तैयारी करते हैं और परीक्षा का पेपर लीक हो जाता है। पांच साल तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के बाद भी न्याय का फैसला किसी अदालत की फाइलों में उलझकर रह जाता है। आने वाले कल का भविष्य और भी ज्यादा डरावना और गंभीर होता जा रहा है। जो किसान अपनी जमीन गिरवी रखकर अपने बेटे को इंजीनियर बनाने की कोशिश कर रहा है या जो मां अपने गहने बेचकर अपनी बेटी को कोडिंग सिखा रही है। क्या उन सभी अभिभावकों को इस बात की कोई गारंटी है कि उनके बच्चों का भविष्य पूरी तरह से सुरक्षित है या नहीं। इस गंभीर सवाल का जवाब देने वाला आज सत्ता के गलियारों में कोई भी व्यक्ति नजर नहीं आता है। हमारे देश की राजनीति में आज सब कुछ मौजूद है जैसे कि बड़ी सत्ता, भूमि पूजन के भव्य कार्यक्रम और चारों तरफ फैला हुआ भारी शोर लेकिन वहां किसी भी प्रकार की सार्थक सोच का पूरी तरह से अकाल है। उन्होंने कहा कि मुझे देश की इसी विचारहीन और उदासीन राजनीति का पूरा हिसाब चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी को एक सही दिशा मिल सके।