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राजनीतिक सरगर्मी तेज: राजस्थान में निकाय चुनाव नतीजों से पहले कांग्रेस और बीजेपी ने शुरू की बाड़ेबंदी
राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे आने से पहले राजनीतिक दलों की बेचैनी साफ देखने को मिल रही है। परिणामों के ऐलान से ठीक पहले कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों ही प्रमुख दलों ने अपने पार्षदों और संभावित विजेताओं को सुरक्षित ठिकानों पर भेजने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है, जिसे राजनीतिक गलियारों में 'बाड़ेबंदी' कहा जाता है।
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Ankit Yadav
13 सित 2026, 13:49
राजस्थान के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों सुगबुगाहट अपने चरम पर है क्योंकि स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे आने में अब कुछ ही वक्त बाकी है। चुनाव परिणामों के ठीक पहले दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने अपने पाले में गोलबंदी तेज कर दी है। चुनावी मैदान में अपनी जीत सुनिश्चित करने और नतीजों के बाद किसी भी तरह की हॉर्स ट्रेडिंग यानी पार्षदों की खरीद-फरोख्त की आशंका को रोकने के लिए दोनों दलों ने एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। इसी कड़ी में सुरक्षित स्थानों पर नेताओं और पार्षदों को ठहरवाने की कवायद शुरू हो चुकी है, जिसे आम बोलचाल की भाषा में बाड़ेबंदी कहा जाता है।
कड़े मुकाबले के बीच जोड़तोड़ की सियासत
में इस बात का जिक्र करना जरूरी है कि स्थानीय निकायों के चुनाव अमूमन बेहद करीबी होते हैं, जहां वार्ड स्तर के परिणामों में मामूली अंतर भी सत्ता का समीकरण बदल सकता है। ऐसे नाजुक मौकों पर किसी भी तरह के राजनीतिक उलटफेर से बचने के लिए दोनों ही दल पूरी तरह सतर्क नजर आ रहे हैं। राज्यभर के विभिन्न जिलों से ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि उम्मीदवारों को अज्ञात स्थलों या रिसॉर्ट्स में सुरक्षित शिफ्ट किया जा रहा है ताकि विपक्षी दल उन तक पहुंच न बना सकें। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजस्थान में निर्दलों और बागी उम्मीदवारों की भूमिका भी इस बार काफी अहम होने वाली है, और यही वजह है कि दोनों ही दल अपनी रणनीतिक बढ़त को बनाए रखने के लिए कोई जोखिम नहीं लेना चाहते।
सुरक्षा और निगरानी का सख्त पहरा
चुनावी नतीजों के आने से पहले राजनीतिक दलों के खेमे में इस तरह की हलचल नई नहीं है, लेकिन इस बार सरगर्मी कुछ ज्यादा ही तेज दिखाई दे रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और रणनीतिकार खुद इस पूरी प्रक्रिया पर पैनी नजर बनाए हुए हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि चुनाव परिणामों के तुरंत बाद सत्ता का संतुलन उनके पक्ष में ही रहे। चाहे वह कांग्रेस का खेमा हो या फिर बीजेपी का मुख्यालय, दोनों ही जगहों पर मंथन का दौर लगातार जारी है। कार्यकर्ताओं से लेकर शीर्ष नेतृत्व तक सभी की निगाहें अब केवल आने वाले चुनाव परिणामों पर टिकी हुई हैं, जो यह तय करेंगे कि स्थानीय निकायों की बागडोर किसके हाथ में जाएगी।
आगे की रणनीति और परिणाम का इंतजार
नतीजों के घोषित होने के बाद बोर्ड गठन की प्रक्रिया शुरू होगी, और यही वह समय होता है जब सबसे ज्यादा राजनीतिक उठापटक देखने को मिलती है। इसी आशंका के चलते पहले से ही बाड़ेबंदी कर दी गई है ताकि अंतिम समय में पार्षदों की निष्ठा को बदला न जा सके। आने वाले कुछ दिनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि किस दल की रणनीति सफल होती है और किसे मायूस होना पड़ता है। फिलहाल राजस्थान का सियासी पारा चढ़ा हुआ है और हर कोई चुनावी परिणामों के ऐलान का बेसब्री से इंतजार कर रहा है।