आरोपों पर तीखी प्रतिक्रिया और खंडन भारतीय राजनीति में इन दिनों चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग अपने चरम पर पहुंच गई है, जिसके तहत एक ताजा घटनाक्रम में जतिंदर पाल मल्होत्रा ने कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के तमाम नेताओं द्वारा लगाए गए सभी आरोपों को पूरी तरह से बेबुनियाद और झूठा करार दिया है। उन्होंने अपने बयान में इस बात पर विशेष जोर दिया कि विपक्षी दलों द्वारा चुनाव संचालन प्रक्रिया और आयोग की निष्पक्षता पर जो सवालिया निशान उठाए जा रहे हैं, वे तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह गलत और राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं। उनके अनुसार, जब भी चुनावी नतीजे किसी दल की मनमुताबिक उम्मीदों के अनुरूप नहीं आते हैं, तब इस प्रकार के निराधार आरोप लगाने की एक पुरानी परिपाटी सी बन गई है, जो न केवल लोकतांत्रिक परंपराओं के प्रतिकूल है बल्कि निर्वाचन आयोग जैसी स्वायत्त संवैधानिक संस्था की गरिमा को भी ठेस पहुंचाने का कुत्सित प्रयास है, जिसे किसी भी कीमत पर उचित नहीं ठहराया जा सकता है।
संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका और संदर्भ भारत जैसे विशाल और विविधता से भरे लोकतांत्रिक देश में चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता देश के पूरे शासन तंत्र की रीढ़ मानी जाती है, जहां हर चुनाव को पूरी पारदर्शिता, निष्पक्षता और कानून के दायरे में संपन्न कराने की जिम्मेदारी इस संवैधानिक निकाय की होती है। देश के चुनावी इतिहास में हमेशा से यह अपेक्षा की जाती रही है कि सभी राजनीतिक दल चुनाव आयोग के नियमों और निर्देशों का पालन करते हुए अपनी राजनीतिक गतिविधियां संचालित करें, लेकिन पिछले कुछ समय से यह देखा जा रहा है कि राजनीतिक दलों के बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता के कारण चुनाव प्रबंधन और ईवीएम से लेकर मतगणना तक की पूरी प्रक्रिया पर अनावश्यक संदेह व्यक्त किया जाने लगा है। इस तरह के माहौल से न केवल आम मतदाताओं के मन में भ्रम की स्थिति पैदा होती है बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता का जो अटूट विश्वास होता है, उसे भी गहरा आघात पहुंचता है। जानकारों का मानना है कि इस प्रकार के राजनीतिक टकराव से बचने के लिए सभी दलों को अपनी ऊर्जा रचनात्मक मुद्दों पर लगानी चाहिए न कि संवैधानिक संस्थाओं की कार्यकुशलता पर बेबुनियाद सवाल खड़े करने में।
भविष्य का प्रभाव और राजनीतिक गलियारे इस ताजा बयानबाजी के बाद देश के राजनीतिक गलियारों में सरगर्मी काफी बढ़ गई है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक और अधिक तेज होने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि आगामी चुनावी रणनीतियों को तय करने में इस प्रकार के वैचारिक मतभेद एक बहुत बड़ी भूमिका निभाएंगे, क्योंकि दोनों ही पक्ष जनता के बीच अपनी बात को सही साबित करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं। जहां एक ओर विपक्षी गठबंधन चुनाव आयोग पर दबाव बनाने और अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए मुखर होकर विरोध दर्ज करा रहा है, वहीं दूसरी ओर सत्ता पक्ष के नेता इन आरोपों का करारा जवाब देते हुए विपक्षी दलों की मंशा पर ही गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया का दूरगामी असर देश की चुनावी राजनीति पर पड़ना तय माना जा रहा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आने वाले समय में निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस और अधिक तीखी तथा व्यापक होने वाली है।