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राजनीति

शेषन विवाद: चुनाव टालने पर 1991 में पीएम चंद्रशेखर की सरकार के समय गर्माई थी सियासत

वर्ष 1991 के लोकसभा चुनावों के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने पंजाब और असम में मतदान की तारीखों में बदलाव किया था। इस कड़े फैसले के बाद राजनीतिक दलों और केंद्र सरकार के बीच भारी टकराव देखने को मिला था।

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Ankit Yadav
02 अक्ट 2026, 14:39
शेषन विवाद: चुनाव टालने पर 1991 में पीएम चंद्रशेखर की सरकार के समय गर्माई थी सियासत

मार्च 1991 में शुरू हुआ था चुनाव और सुरक्षा का विवाद

साल 1991 के मार्च महीने में लोकसभा चुनाव की आधिकारिक अधिसूचना जारी की गई थी। उस वक्त देश के पंजाब, जम्मू कश्मीर और असम राज्यों में भयंकर हिंसा का माहौल चल रहा था। गृह मंत्रालय की खुफिया रिपोर्टों के आधार पर पंजाब में चुनाव कराना असंभव बताया जा रहा था। इसके बावजूद प्रधानमंत्री चंद्रशेखर वहां चुनाव करवाने के पक्ष में खड़े थे। विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेयी और वाम दलों ने भी पंजाब और असम में मतदान कराने का खुलकर विरोध किया था। पंजाब के राज्यपाल ने केंद्र सरकार से अर्धसैनिक बलों की चार सौ अतिरिक्त कंपनियों की मांग की थी। पहले से ही वहां तीन सौ कंपनियां तैनात थीं जिससे सुरक्षा बलों का बड़ा हिस्सा केवल एक राज्य में लग जाता। गृह सचिव ने ग्यारह मार्च को मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर पंजाब में विधानसभा चुनाव भी साथ कराने को कहा। मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन इस बात के पूरी तरह खिलाफ थे कि अशांत पंजाब में तुरंत चुनाव कराए जाएं। सरकार के दबाव के बावजूद शेषन ने अपने रुख से पीछे हटने से साफ मना कर दिया था। अंत में सरकार के निर्देश पर पंजाब और असम के लिए लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी कर दी गई।

चुनाव टालने के फैसले पर भड़की भाजपा और विपक्षी पार्टियां

अधिसूचना जारी होने के तुरंत बाद पंजाब के राज्यपाल ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र भेजकर मतदान की तारीख बढ़ाने का अनुरोध किया। सुरक्षा कर्मियों की भारी कमी के कारण राज्यपाल ने चुनाव की तारीखें जून महीने के मध्य तक बढ़ाने की बात कही थी। टीएन शेषन ने अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए मतदान की तिथि बदलकर बाईस जून तय कर दी। चुनाव आयोग के इतिहास में पहली बार किसी मुख्य चुनाव आयुक्त ने इस तरह की शक्ति का प्रयोग किया था। इस बीच इक्कीस मई की रात को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या होने के बाद देश में स्थिति और गंभीर हो गई। शेषन ने हालात का जायजा लेकर पंजाब में चुनाव तीन महीने यानी पच्चीस सितंबर तक के लिए स्थगित कर दिया। शेषन ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धाराओं का हवाला देकर इस फैसले को अंजाम दिया था। इस कार्रवाई से नाराज होकर विपक्षी दलों ने शेषन को पद से हटाने के लिए महाभियोग लाने की तैयारी शुरू कर दी थी। भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने राष्ट्रपति से मुलाकात कर शेषन को तत्काल बर्खास्त करने की मांग उठाई थी। जनता दल के नेताओं ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए नोटिस भेजकर संसद में महाभियोग की चेतावनी दी थी।

आत्मकथा में दर्ज है शेषन पर महाभियोग और इस्तीफे का पूरा सच

टीएन शेषन ने अपनी आत्मकथा 'थ्रू द ब्रोकेन ग्लास' में इस पूरे घटनाक्रम का विस्तार से जिक्र किया है। उन्होंने लिखा है कि विपक्ष के पास महाभियोग प्रस्ताव को संसद में पारित कराने लायक पूर्ण बहुमत नहीं था। इसके बावजूद राजनीतिक दलों की तरफ से उन पर लगातार इस्तीफा देने का दबाव बनाया जा रहा था। सरकार की ओर से उन्हें सोवियत संघ या अमेरिका में देश का राजदूत बनाए जाने के प्रस्ताव भी दिए गए थे। खेल सचिव एमएम राजेंद्रन का नाम भी इस सिलसिले में तेजी से हवा में तैरने लगा था। हालांकि टीएन शेषन ने स्पष्ट किया कि उनका पद छोड़ने का कभी कोई इरादा नहीं था और वह अपने फैसले पर अडिग रहे। सितंबर महीने के शुरुआती दिनों में प्रधानमंत्री ने भी पंजाब में चुनाव टालने के संकेत दे दिए थे। संसद ने अठारह सितंबर को पंजाब में राष्ट्रपति शासन को छह महीने और बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। राजनीतिक दलों के बीच गतिरोध कम होने के बाद आखिरकार फरवरी 1992 में पंजाब के अंदर चुनाव संपन्न कराए गए। इस तरह लगभग पैंतीस साल पहले मुख्य चुनाव आयुक्त और देश की सरकार के बीच अधिकारों की यह ऐतिहासिक जंग लड़ी गई थी।

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