जोबा मांझी का तीखा हमला और केंद्र सरकार से सीधी मांग झारखंड की राजनीति में उस वक्त सरगर्मी तेज हो गई जब वरिष्ठ नेता जोबा मांझी ने केंद्र सरकार के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख अख्तियार करते हुए एक जनसभा या बयान के दौरान तीखा प्रहार किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह बात रखी कि केंद्र की तरफ से लाए जा रहे कुछ ऐसे प्रावधान और नीतियां बनाई जा रही हैं जो सीधे तौर पर देश के संघीय ढांचे पर बड़ा आघात पहुंचा रही हैं। उनका मुख्य तर्क यह था कि इस तरह के कदमों से प्रांतीय सरकारों के हाथ बंध जाते हैं और वे अपने राज्य के स्थानीय नागरिकों के कल्याण के लिए स्वतंत्र रूप से फैसले लेने में असमर्थ हो जाती हैं। इसी बात को आधार बनाते हुए उन्होंने केंद्र सरकार को ललकारते हुए फौरन इस काले कानून को वापस लेने की मांग की ताकि राज्यों की स्वायत्तता और उनकी प्रशासनिक शक्तियां सुरक्षित बनी रहें और देश का लोकतांत्रिक ढांचा बिना किसी रुकावट के मजबूत गति के साथ आगे बढ़ सके।
संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों पर मंडराता हुआ गंभीर खतरा भारतीय संविधान की मूल आत्मा सहकारी संघवाद पर टिकी हुई है जिसमें केंद्र और राज्य दोनों ही अपनी निर्धारित सीमाओं और शक्तियों के भीतर रहकर जनता के विकास के लिए कार्य करते हैं। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से लगातार इस बात पर बहस छिड़ी रहती है कि केंद्रीय नीतियों के जरिए क्षेत्रीय सरकारों के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार धीरे-धीरे सीमित किए जा रहे हैं। जब किसी राज्य की प्रशासनिक इकाइयों या स्थानीय नेतृत्व को विकास कार्यों के निर्णय लेने से रोका जाता है या उनकी अनुमति के बिना बड़े फैसले थोप दिए जाते हैं तो इससे जमीनी स्तर पर जनता का भारी नुकसान होता है। इस प्रकार की प्रशासनिक खींचतान से न केवल सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में अनावश्यक देरी होती है बल्कि आम नागरिकों के बीच यह संदेश भी जाता है कि केंद्र सरकार राज्यों की चुनी हुई सरकारों को कमजोर करने की मंशा रखती है। ऐसे में जोबा मांझी जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों का मुखर होकर सामने आना और इस व्यवस्थागत खामी के खिलाफ आवाज उठाना इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में केंद्र और राज्यों के संबंधों को लेकर राजनीतिक पारा काफी ज्यादा चढ़ने वाला है।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं और भविष्य के बड़े आंदोलन की रूपरेखा जोबा मांझी द्वारा उठाए गए इस कड़े कदम के बाद राज्य के भीतर और राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाओं का दौर तेजी से शुरू हो चुका है। विपक्षी दलों से जुड़े कई नेताओं ने इस बयान का समर्थन करते हुए केंद्र सरकार पर तानाशाही रवैया अपनाने का गंभीर आरोप लगाया है और यह चेतावनी दी है कि यदि इस कानून को वापस नहीं लिया गया तो सड़कों पर उतरकर बड़ा आंदोलन छेड़ा जाएगा। दूसरी तरफ सत्ताधारी दल के समर्थक यह दलील देते नजर आ रहे हैं कि ऐसे कानून राष्ट्रहित और प्रशासनिक एकरूपता के लिए बेहद आवश्यक हैं ताकि देश के हर कोने में एक समान विकास मॉडल लागू किया जा सके। इस वैचारिक और राजनीतिक रस्साकशी के बीच आम जनता और क्षेत्रीय मतदाता भी इस बात पर गहरी नजर बनाए हुए हैं कि उनके प्रतिनिधियों की यह लड़ाई आने वाले चुनावों या विधानसभा सत्रों में क्या रंग दिखाती है। कुल मिलाकर यह पूरा घटनाक्रम आने वाले दिनों में झारखंड के सियासी आसमान पर एक बड़ा तूफान खड़ा करने की पूरी क्षमता रखता है जिसका असर दूरगामी साबित हो सकता है।