मतदाता सूचियों में गंभीर विसंगतियां
उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में मतदाता सूचियों के भीतर गंभीर और हैरान करने वाली तकनीकी खामियां लगातार सामने आ रही हैं। ताजा मामलों के अनुसार आजमगढ़ जिले के एक ही घर के भीतर चौदह विकास यादव नाम के मतदाताओं के नाम दर्ज होने की बात सामने आई है। इसी प्रकार गोरखपुर जिले की मतदाता सूची की जांच करने पर छह अनुराग नाम के मतदाता एक ही स्थान पर पाए गए हैं। चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाने के लिए प्रशासन द्वारा तमाम प्रयास किए जाते रहे हैं। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर तैयार होने वाली इन सूचियों में इस तरह की पुनरावृत्ति होना प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े करता है। अधिकारियों द्वारा इस पूरी गड़बड़ी की गंभीरता से जांच की जा रही है ताकि वास्तविक मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित की जा सके। इस प्रकार की त्रुटियों के कारण चुनाव के दौरान फर्जी मतदान की आशंकाएं भी काफी हद तक बढ़ जाती हैं। स्थानीय स्तर पर तैनात बीएलओ यानी बूथ लेवल अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी इस घटना के बाद कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। ऐसे मामलों से यह साफ पता चलता है कि मतदाता सूचियों के सत्यापन के कार्य में कितनी बड़ी लापरवाही बरती गई है।
सॉफ्टवेयर की नाकामी और तकनीकी सीमाएं
मतदाता सूचियों में मौजूद इन भारी भरकम गड़बड़ियों को पकड़ने में तकनीक और सॉफ्टवेयर भी पूरी तरह से असफल साबित हुए हैं। निर्वाचन विभाग द्वारा डेटा की शुद्धता जांचने के लिए जिस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जाता है, वह इन नामों की पुनरावृत्ति को नहीं पकड़ पाया। एक ही पते पर या एक ही घर के भीतर एक जैसे नामों के इतने सारे प्रविष्टि दर्ज होने के बाद भी सिस्टम ने कोई चेतावनी जारी नहीं की। जानकारों के अनुसार सॉफ्टवेयर की इस नाकामी के पीछे तकनीकी एल्गोरिदम की सीमाएं या फिर डेटा फीडिंग के दौरान बरती गई भारी मानवीय चूक मुख्य कारण हो सकती है। जब तक डेटा ऑपरेटर द्वारा सही जानकारी पोर्टल पर अपडेट नहीं की जाती है, तब तक कोई भी उन्नत सॉफ्टवेयर अपने आप सुधार नहीं कर सकता है। इस तकनीकी खामी के कारण अब चुनाव आयोग के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है कि वह बिना इंसानी हस्तक्षेप के ऐसे मामलों की पहचान कैसे करे। सॉफ्टवेयर द्वारा डुप्लीकेट प्रविष्टियों को स्वतः हटाने की प्रक्रिया फेल होने के बाद अब मैनुअल यानी हस्तों से सत्यापन का काम तेजी से शुरू किया गया है। कंप्यूटर आधारित व्यवस्था के फेल होने से निर्वाचन आयोग के तकनीकी अमले की कार्यकुशलता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया है।
एसआईआर प्रक्रिया के बाद भी कमियां
प्रदेश भर में हाल ही में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर अभियान का संचालन किया गया था ताकि मतदाता सूचियों को पूरी तरह साफ और दुरुस्त किया जा सके। इस बड़े अभियान के दौरान घर-घर जाकर सर्वे करने और फर्जी नामों को हटाने का दावा जिला प्रशासन द्वारा किया गया था। इसके बावजूद आजमगढ़ और गोरखपुर जैसे जिलों में इस तरह की बड़ी खामियां मिलना यह साबित करता है कि अभियान कागजों तक ही सीमित रह गया। एसआईआर जैसी महत्वाकांक्षी प्रक्रिया के पूरा होने के बाद भी यदि सूचियों में इस स्तर की त्रुटियां बनी हुई हैं तो यह प्रशासनिक अमले की बड़ी विफलता है। इस तरह की कमियों से न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है बल्कि आम जनता का निर्वाचन प्रणाली से भरोसा भी कम होने लगता है। भविष्य में इस प्रकार की अशुद्धियों को रोकने के लिए चुनाव आयोग को और अधिक कठोर और प्रभावी कदम उठाने की सख्त आवश्यकता है। सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे व्यक्तिगत रूप से सूचियों की जांच करें और एक ही घर में दर्ज फर्जी नामों को तुरंत हटाएं। इस पूरी घटना ने एक बार फिर से चुनावी तंत्र के आधुनिकीकरण और मैदानी स्तर पर उसकी प्रभावशीलता की पोल खोलकर रख दी है।