एग्जिट पोल के नतीजे और सीटों की स्थिति
इजरायल में हाल ही में संपन्न हुए चुनाव के एग्जिट पोल सामने आ चुके हैं। इन शुरुआती आंकड़ों के अनुसार चुनाव परिणामों में एक बहुत बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। देश के मौजूदा राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से उलझ गए हैं क्योंकि किसी भी पक्ष को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। बेंजामिन नेतन्याहू और उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी यानी विपक्षी दल दोनों को ही ठीक इक्यावन सीटें हासिल हुई हैं। इस प्रकार दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमे सीटों के मामले में बिल्कुल बराबरी पर खड़े हैं। इजरायल की संसद में बहुमत का जादुई आंकड़ा हासिल करने के लिए दोनों पक्षों को अब संघर्ष करना होगा। इस बराबरी के मुकाबले के बाद देश की राजनीति में अनिश्चितता का माहौल बन गया है। किसी भी एक पक्ष के पास अकेले दम पर सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या बल नहीं बचा है। इस नाटकीय मुकाबले ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका दिया है क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान मुकाबला काफी कड़ा माना जा रहा था। एग्जिट पोल के इन नतीजों के आने के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में बैठकों का दौर शुरू हो चुका है।
सरकार गठन की चुनौती और राजनीतिक समीकरण
चुनाव परिणामों में बराबरी की स्थिति आने के बाद इजरायल में नई सरकार का गठन करना एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। बेंजामिन नेतन्याहू और विपक्षी दलों के नेताओं के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि वे संसद में बहुमत कैसे साबित करेंगे। इजरायली राजनीतिक प्रणाली के अनुसार सरकार बनाने के लिए छोटे दलों और अन्य राजनीतिक गुटों का समर्थन हासिल करना अनिवार्य होता है। वर्तमान में दोनों मुख्य पक्षों के पास इक्यावन सीटें हैं और सरकार चलाने के लिए उन्हें अन्य दलों को साथ लाना होगा। ऐसे में किंगमेकर की भूमिका निभाने वाले छोटे राजनीतिक दलों का महत्व बहुत अधिक बढ़ गया है। छोटे दल अपनी शर्तों पर समर्थन देने की मांग कर सकते हैं जिससे मोलभाव की राजनीति तेज होने की पूरी संभावना है। नेतन्याहू के विरोधी दल भी सरकार बनाने के लिए हरसंभव कूटनीतिक प्रयास करने में जुटे हुए हैं। देश के राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन बनाने और सरकार के स्वरूप को लेकर गुप्त और खुली बैठकें आयोजित की जा रही हैं। यदि कोई भी पक्ष बहुमत का जरूरी आंकड़ा जुटाने में असफल रहता है तो देश को दोबारा चुनावों का सामना करना पड़ सकता है। इस कठिन परिस्थिति से निपटने के लिए सभी दलों के वरिष्ठ नेता अपनी अगली रणनीति तैयार करने में व्यस्त हैं।
संसदीय लोकतंत्र और चुनाव की पृष्ठभूमि
इजरायल की संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव परिणाम अक्सर काफी जटिल और विभाजित जनादेश वाले होते हैं। देश की आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के कारण किसी भी एक अकेली पार्टी के लिए अपने दम पर बहुमत पाना हमेशा से मुश्किल रहा है। यही कारण है कि इजरायल में अधिकांश सरकारें हमेशा मिली-जुली यानी गठबंधन के आधार पर ही बनती आई हैं। इस ताजा चुनावी परिणाम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि देश की जनता का जनादेश स्पष्ट रूप से विभाजित है। जनता ने किसी भी एक नेता या दल को एकतरफा अधिकार नहीं सौंपा है बल्कि दोनों पक्षों को लगभग समान समर्थन दिया है। इस तरह की राजनीतिक स्थिति से देश के भीतर प्रशासनिक और नीतिगत स्तर पर स्थिरता बनाए रखने की चुनौती पैदा होती है। पिछले कुछ वर्षों में इजरायल की राजनीति में लगातार अस्थिरता का दौर देखा गया है और बार-बार चुनाव कराने पड़े हैं। ताजा नतीजों के बाद एक बार फिर वही पुरानी अनिश्चितता देश के राजनीतिक भविष्य पर मंडराने लगी है। आम नागरिकों और व्यापारियों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि राजनीतिक दल मिलकर देश को इस गतिरोध से कैसे बाहर निकालते हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि देश में स्थायी सरकार बनेगी या राजनीतिक संकट और अधिक गहराएगा।